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सर अनामलई चेटीयरको है। बहुत से छोटे छोटे कालिज इत्यादि जो केवल इन्हींकी उदारतासे चलते थे वे सब इन्होंने विद्यालयके अधीन करदिया और २० लाख रुपये इसके सञ्चालनके लिये और प्रदान किये। उच्चशिक्षा के साथ ही साथ तामिल प्रदेशकी विशेष छान बीन करना ही इसका मुख्य उद्देश है। अन्य विश्व-विद्यालयोंकी भाँति इसका भी संचालन सिण्डीकेट, सिनेट तथा एकडेमिक कौन्सिल द्वारा होता है, किन्तु सर अनामलई तथा उनके उत्तराधिकारियोंको विशेष अधिकार दिये गये हैं। इस के चैन्सलर सूबे के गवर्नर होते हैं। अनार——एक प्रसिद्ध फल (देखिये दाडिम)। अनारकली——मुग़लकालकी एक प्रसिद्ध स्त्री। यह जहाँगीरके समयमें होगई है। यह नादिरा बेग़मके नामसे भी प्रसिद्ध है। लाहोर में ‘अनारकली’ के नाम से इसका मकबरा प्रसिद्ध है। इसके सम्बन्ध अनेक दन्तकथायें प्रसिद्ध हैं। कुछ का कथन है कि जहांगीरके समयमें यह किसी राजघरानेसे थी किन्तु कुछका अनुमान है कि यह एक दासीका नाम है जिससे जहाँगीर को गुप्त प्रेम था। इसी कारण से अकबरने इसे जीवित ही गाड़ देने की आज्ञा दे दी थी। सम्भव है कि यह बात अक्षरशः सत्य न हो किन्तु इतना तो निश्चय पूर्वक ही कहा जा सकता है कि ‘अनारकली’ नाम की स्त्री जिसके नामसे लाहोरकी मकबरा विख्यात हो रहा है वह अकबर अथवा जहांगीर के समय में अवश्य हुई हैं और इसका प्रेमी राजघरानेके होने के साथ ही साथ इसके प्रेम में पूर्ण रूपसे रंगा हुआ था। यह बात इसकी कब्र पर खुदे हुए पद्य ही से सिद्ध हो जाती है। उसका आशय इस भाँति है:—— “हा खेद! यदि एक बार मैं अपनी मृत-प्रिया का मुख किसी भी भाँति देख सकूँ तो मैं अपने को धन्य मानूँ और अनन्त काल तक ईश्वर का गुण गाऊँ।” (वील-ओरियटल वायग्राॅफिकल डिक्शनरी) “अर्ली ट्रेवल्स इन इण्डिया सन् १५८३-१६१९ ई॰ नामक ग्रंथमें विलियम फिंचने लिखा हैं कि यह कब्र मैंने अपनी आंखों से देखा है। उसका मत है कि ‘अनारकली’ अकबर की उप पत्नि और शाहजादे दानियालकी माता थी। सलीम से भी इसका कुछ अनुचित सम्बन्ध था। जब अकबरका विदित हुआ तो उसने क्रुद्ध होकर |
इसे दीवारमें चुनवा दिया। किन्तु जब सलीम गद्दी पर बैठा तो उसने इसके स्मरणार्थ लाहोर में एक सुन्दर मकबरा बनवाया जो इसीके नामसे प्रसिद्ध हो गया। एडवड टेरी नामक दूसरे यात्री (१६१६-१६१९) का भी मत है कि यह अकबरकी विशेष प्रियभाजन थी, किन्तु सलीम से इसका अनुचित सम्बन्ध था। इसी कारण से अकबर सलीमको अपने उत्तराधिकारीके पदसे अलग करना चाहता था। अनावल——यह गुजराती खेड़ावालका एक वर्ग है। इनमें भथेला, (भ्रष्टेला) देसाई तथा मस्तान (महास्थान) आदि अनेक शाखायें हैं। कदाचित् बड़ौदाके नवसरी जिलाके महुआ ताल्लुके के अनावल नामक गाँवके नामके अधारपर इस वर्गकी उत्पत्ति हुई होगी। कुछका विचार है कि गुजरातके पहले पहल निवासीका नाम अनावल था। उसीसे यह वर्ग निकला। कुछ लोग इन का सम्बन्ध बड़ौदा राज्यमें जो गरम पानीका झरना है उससे स्थापित करते हैं। स्कन्दपुराणमें कथा है कि जब लङ्का विजयकर रामचन्द्रजी पुष्पक विमान द्वारा अयोध्या जारहे थे उस समय विध्य-पर्वतपर स्थित अगस्त्याश्रममें मुनिदर्शनार्थ नीचे उतरे थे। इसी स्थान पर मुनिकी आज्ञानुसार रावण-बधका प्रायश्चित्त किया था। आगे चल कर यही स्थान अनावलके नामसे प्रसिद्ध हुआ। यहाँ केवल भीलोंकी बस्ती थी। अतः हिमालय के गंगा कुलगिरिसे ब्राह्मण बुलवाये गये। ये बारह सहस्र ब्राह्मण थे जिनके बारह भिन्न भिन्न गोत्र थे। इन्होंने बारह सहस्र शेषकन्याओंसे विवाह किया था। इन्हीं ब्राह्मणों की सुविधाके लिये श्रीरामचन्द्रने गरम जलके सोतेका निर्माण किया था। इन ब्राह्मणोंने रामकी दी हुई दक्षिणका निरादर करके ग्रहण करना अस्वीकार किया। फलतः रामचन्द्रने भी इन्हें श्राप दिया कि वे निम्न-श्रेणीके गिने जावेंगे और वे वेदपाठ, याज्ञिक कर्म तथा दक्षिणा ग्रहण करनेके अधिकारसे च्युत हो जावेंगे और इनकी गणना वैश्यवर्गमें होने लगेगी दूसरी कथा इस प्रकार है कि ब्राह्मणों के अभाव के कारण श्रीरामने भीलों ही द्वारा सब यज्ञकर्म करा डाले। किन्तु केवल इतने ही से उनकी गणना उच्च श्रेणीके ब्राह्मणों में नहीं होसकी। नवसारीप्रान्तमें इनकी बस्ती बहुत है। १९११ ई॰ की जनसंख्याके अनुसार बड़ौदामै ९५७६ अनावल थे। इनकी गणना जमीदारों और |
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अनारकली
अनावल
ज्ञानकोश (अ) २३२