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पर अपनी. बोलचालकी भाषा दिल्ली ही की रखते थे। इसका इन्हे गर्व था। इन्होंने बालक स्त्री पुरुष, योद्धा, कायर, प्रेमी तथा सेवक आदि सभीके मनोभावोंको व्यक्त करनेमें कमाल किया है। इनकी कल्पनाशक्ति बड़ी विलक्षण थी। ख्यालकी बारीकीका तो कहना ही क्या है। इनकी कविता सात्विक भावों, शिक्षाओं तथा महत्वसे परिपूर्ण । कहीं कहीं तो प्रकृतिका जीता जागता चित्र तक उतार दिया है। नीचेके चुने हुए थोड़ेसे और उनकी प्रतिभाकी झलक दे देते हैं। (१) नामूदो बूद आकिल हुबाब समझे हैं। वो जांगते हैं जो दुनियाँको ख्वाब समझे हैं. (२) अब गर्म खबर मौत के श्राने की है। नादाँ तुझे फिक्र श्राबोदाने की है। होता है। (३) जब साल गिरह हुई तो उकदयःखुला । यों गिरह से एक बरस और जाता है। (४) क्योंकर न लपटके तुझसे सोऊ ऐ कन्न। मैंने भी तो जान देके पाया है तुझे।। अनु-(१) शर्मिष्ठाके गर्भसे सोमवंशी राजा ययातिका पुत्र था। पिताके कहने पर इसने । उनकी बुढ़ौतीसें अपना यौवन परिवर्तन नहीं किया जिससे उन्होंने मुख्य राज्याधिकारसे इसे वञ्चित कर दिया और ग्लेच्छाधिपत्य प्रदान किया। सभानरं, चक्षुः और परोक्ष नामके इनके तीन पुत्र थे। (मत्स्य पुराणं.३४) सोमवंशी ) यदुपुत्र कोष्टाके ज्यांमध वंशमै इसका जन्म हुआ था। यह क्रथ कुलके कुरुवंश का एक राजपुत्र था जिसके पुरुहोन नामक एक पुत्र था। (४) ऋग्वेदमें अनु और भानवके राज्य का उल्लेख मिलता है। यदु, पुरु, तुर्वश, द्रुह्य, इत्यादि लोगोंके साथ ये भी उत्तर हिन्दुस्थानमें परुष्णीके किनारे रहते थे। इनका इतिहास दास राक्ष युद्धके तीसरे प्रकरणमें मिलता है। अनुनय-इस शब्दका साधारणतया दो अर्थों में प्रयोग होता हैः-एक प्रार्थना और दूसरा प्रेम याचना। दूसरे अर्थका सोपपत्तिक विचार करने के लिये उसको तीन भाग करना होगा-यतः विवाहपूर्व अनुनय, विवाहोत्तर अनुनय और विवाहनियमविरुद्ध अनुनयः। जब पशु पक्षियों में भी संभोगापेक्षा अनुनय दिखायी पड़ता है: तब |
मनुष्य जातिमें इसका प्रयोग होना कोई आश्चर्य की बात नहीं। गान्धर्व विवाहके अतिरिक्त अन्य विवाहपद्धतिमें इसका प्रयोग नहीं होता अत भारत वर्षमें इसका उदाहरण यदाकदा ही प्राप्त होता है। सीता, द्रौपदी, सावित्री एवं शकुन्तला श्रादिके विवाहोंमें विवाहपूर्व अनुनयका आभास मिलता है फिरभी इस प्रथाका भारतवर्ष में अधिक प्रचार नहीं दृष्टि गोचर होता। हाँ, पाश्चात्य देशो में इसका प्रायः विकास दिखायी पड़ता है जिस का प्रधान कारण वहांकी स्त्रियोकी स्वतंत्रताही कहा जा सकता है। उन देशोंमें श्रौद्योगिक एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रताके कारण कुमारियोंको पुरुषका ।।सहयोग एवं उनसे एकान्तवासका प्रायः अवसर मिला करता है और उसी दशामें यह संभव भी भारतवर्ष में ज्यो ज्यो पाश्चात्य सभ्यता का विकास एवं पाश्चात्य संस्कृतिका प्रचार होता जाता है त्यो त्यो इसका भी प्रचार होने लगा है और सम्भव है कि आगे चलकर यहाँ भी इसकी प्रथा चल जाये। अनुभवजनित ज्ञानवाद-यह सुनिश्चित मत है कि सब प्रकारके शान इन्द्रियदत्त होते हैं। इसमतके अनुसार प्रारम्भमै मन बिलकुल कोरा रहता है, उसपर इन्द्रियदस्त समवेदना यान्त्रिक रीतिसे लिपिवद्ध होती है। मानसिक कार्यका उसमें कोई अंश नहीं रहता। मनके ज्ञान पूर्ण होनेकी इस क्रियामें अपरिचित व्यक्तिगत संवेदना रहती है। (एकसी बातो हो के बारम्बार होने अथवा पुनरा- गमनसे नियमोकी कल्पना तथा उत्पत्ति होती हैं। एक ये साहचर्यके अनुभवसे मिले हुये होते हैं। पर इस विधोनमें यह नहीं कहा जा सकता है कि ऐसा (३) यह क्रथ-वंशोत्पन्न सात्वत-पुत्र अंधकुल , होना नितान्त आवश्यक हो है। इसमें केवल यह के गजा कपोतरामाका पुत्र था। इसे अंधक विधान होता है कि कोई विशेष परम्परा अवश्य नामक एक पुत्र था। पायी जाती है, और उसीसे कार्यकारण भावका विकास होता है। इस सम्बन्धमें आवश्यकता की कल्पना अनुभवपूर्ण रहती 1. अनुभव जनित ज्ञानवादसे अनुभवका स्पष्टीकरण नहीं होता। कहा जाता है कि व्यक्तिगत भावना क्षणिक होती है। अतः इस शानवादमें भी भिन्न भिन्न मानसिक क्रियाओंके आवश्यकतानुसार फल हुआ करते हैं। प्राचीन ग्रीसमें यह मत ;बहुत प्रचलित था। बेकनने भी इस मतके प्रचारके लिये बहुत कुछ किया, तथा लॉक, ह्य म, प्रेथम् एवं अन्य साहचर्यवादियोंने इस मतको व्यवस्थित किया। अनुमति-(१) कर्दम कन्या श्रद्धाके गर्भ |
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अनुभव
ज्ञानकोश (अ) २३६