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उसी वर्ष वर्षाऋतु अनूबाई अपने जागोर धारवारमें गयी और वहां रहने लगी। माताके निकट रहनेसे पुत्रकी स्वतंत्रतामें फिर व्याघात हुआ और उसकी ( नारायणराव) अव्यवस्था एवं अनाचार अनुवाईको सा न हुअा। अतः उसने पुत्रको उसकी स्त्रीके साथ नजर बन्द कर दिया। सन् १७६४ ई० में अस्वस्थ रहने के कारण अनूबाई माधवरावके साथ हैदरकी चढ़ाई में न जा सकी । उधर पानीपतको लड़ाई के बाद हैदरने तुङ्गभद्राके उत्तरमै चढ़ाइयाँ कर धार वारको अपने राज्यमें मिला लिया था । पर इस चढ़ाई में पेशवा ने उसे फिर वापस ले लिया और अनूवाईको दे दिया। अनूबाई की उस बीमारीकी दशा नारायण राव भी उत्पात मचाने लगा था। पर उसके शीघ्र ही स्वस्थ होजाने के कारण वह फिर प्रतिवन्ध रख लिया गया। उधर नारायण रावकी निष्कि यता देखकर पेशवाके भी मनमें आया था कि उस का पद छीन कर किसी अन्य को दे दिया जाय पर सन् १७६६ई के जूनमें अनूबाईने पूना जाकर पेशवा को अपने पक्षमें करलिया, यहां तक कि उसके राज्य पर जो वाकी लगानकी भारी रकम वसूल करनेके लिये सरकारी कारकुन भेजे गये थे उन्हें तो वापस बुलवा ही लिया उस रकममें भी काफी कमी कराली। सन् १७७०ई० में जब पेशवाने कर्नाटक पर चढ़ाईकी तब अनूबाई भी उनके साथ ही थी किन्तु उसी समय पुत्रकी मृत्युका समाचार पाकर वह वापस चली गयी । इस बृद्धावस्था पुत्रशोक की दारुण व्यथा उसे असह्य थी पर पौत्र व्यंकट रावके हितको ध्यानमें रख वह फिर राजकाज में जुट गयी । उसके तीन ही वर्ष बाद उसकी कन्या वेणूबाईके पति त्र्यम्बकराव मामा पंढरपुर के पास राघोबा दादाके पक्षमें लड़ते हुए मारे गये। विधवा कन्याको सांत्वना देने अनूबाई अपने पोतेके लिये पहुँची और वहाँसे वापस आये अभी वर्ष भी नहीं बीता था कि रघुनाथराव दादाके भड़कानेसे करबीर वालोंने पेशवाके राज्यमै अत्याचार करना आरंभ करदिया । इचलकरजी पर भी चढ़ाइयाँ हुईं। अनूबाईने चढ़ाई करने वालोंको तो भार भगाया पर भविष्यमै ऐसी चढ़ाइयाँ रोकने के लिये उसने पेशवासे जो सहायता मांगी थी, वह पेशवा के अंग्रेजों और हैदरके साथ युद्ध में व्यस्त रहनेके कारण न मिल सकी। सन् १७६६ई० में पेशवाको सन्देह हुआ कि भाऊ साहब वास्तव में भाऊ साहब न होकर एक |
बहुरूपिया था। उसने अनूबाईसे इसके सम्बन्ध पूछ ताछ्की, पर अनुवाईने भी उसे भाऊ साहय ही बतादिया। इसपर सन् १७७६ ई० में रत्न गिरि के तहसीलदारने उस बहुरूपियको कैदसे भगा दिया जिसके लिये व्यंकट रावको लड़ाई करनी पड़ी और बहुरूपिया हरा दिया गया। उन्हीं दिनों इचलकरजीके कई गांवों पर जन्तीका वारंट भाया था पर नानाफड़नवीस और सखाराम बापूने अनूबाईकी वृद्धावस्थाका विचार कर सवा लाख रुपया दण्ड स्वरूप लेकर जन्ती लौटाली । उसके कुछ दिनों बाद वह काशी चली गयी जहां सन् १७८३ ई०में उसकी मृत्यु होगयी। राजकाज में वह बहुत चतुर थी। चोरता भी उसमें गजबकी भरी थी। अंतिम अवस्था तक उसने पेशवाकी लड़ाइयों में उसका साथ दिया और स्वयं सैन्य-संचालन करती थी। उसके धैर्य नीति, महत्वाकांक्षा आदिकी सराहना नहीं की जा सकती। वह बड़ी उदार एवं खर्चीली थी जिससे उस पर प्रायः कर्जका बोझ होजाया करता था। खर्च पूरा करनेके लिये उसने कर भी बढ़ा दिया था। अनेकुल गाँव-बंगलोर जिले ( मैसूर रियासत के अनेकुल ताल्लुके का मुख्यनगर है जो बंगलोरसे २२ मील पर अग्निकोणमें स्थित है। यह उ०अ० १२४३' और पू०रे, ७७४२ में स्थित है। इसकी जनसंख्या लगभग पांच हजार है १७वीं शताब्दीमें सुगतूरके राजाने यहांपर एक किला और उसके पासही एक तालाब भी बनवाया था। इसके सौ वर्ष बाद तक वह मैसूर रियासत का माण्डलिक रहा। सन् १७६० ई० में हैदर अलीने उसे अपने राज्यमें मिला लिया। १४०० ई० में डोमिनिकानोंने यहां एक प्रार्थना मन्दिर बनवाया । १८७० ई० से म्युनिसिपैलटी भी स्थापित होगयी है। १६०३-४ ई० में यहां की प्राय ३१००) रु. और व्यय ४६००) था। (इ० ग?, ५)। अनेकुल ताल्लुका-मैसूर राज्यके बंगलोर जिलेके अग्निकोण का एक ताल्लुका है। यह उ० अ० १२४० से १२५५और पूरे ७७३२' से ७७४६ तकमे स्थित है। इसका क्षेत्रफल १६० वर्गमील है । जनसंख्या साठ हजार है। इस ताल्लुके में तीन बड़े बड़े गांव एवं २०२ छोटे छोटे गाँव हैं । १६०३-४ ई मैं यहांको श्राय १२६००००० थी ( इ००५) अनेवाड़ी-सतारा जिलेका एक गाँव ! मराठोंके इतिहासमें इसका उल्लेख अनेक स्थान |
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अनूबाई घोरपड़े
अनेवाड़ी
ज्ञानकोश (अ) २३७