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वाविवाह कानून १८५६ धारा २] । अन्न वस्त्र खर्चकी रकम - विधवा की रकम ठहराते समय ( १ ) उसके पतिकी सम्पत्तिका मूल्य ( २ ) समाजमें उसका स्थान और ( ३ ) विधवाकी आवश्यकताएं एवं उसके धार्मिक कृत्योंका विचार किया जाता है। इसके अतिरिक्त उस विधवा के पास वस्त्र तथा अलंकार यदि अनुत्पादक स्त्रीधन के अतिरिक्त यदि दूसरा दर्वयोत्पादक घन अथवा जीविका चलाने योग्य दूसरा स्वतंत्र धन हो तो उस विधवाकी अन्नवस्त्र माँगनेका अधिकार नहीं होता । अन्य व्यक्तियों के पालनपोषणकी रकम निश्चित करते समय भी ऊपर कही तीनों बातों पर ध्यान देनेका नियम है । उसी तरह मृत व्यक्तिकी सम्पत्ति में जो अंतर होगा उसीके परिमाण में अन्न वस्त्र के अधिकार में भी अंतर होगा । मुसलमानी कानून अन्न वस्त्र-पुरुषोंकी तरह स्त्रियों के भी मायके की सम्पत्ति उत्तराधिकार का अधिकार मिलने के कारण तथा हिन्दू कानूनके समान सम्मिलित परिवार पद्धति न होने के कारण मुसलमानी नियमों में अन्न के अधिकारका क्षेत्र बहुत कुछ मर्यादित होता है। जिस पुरुष या स्त्रीको निजकी सम्पत्तिमै से अपना खर्च चलाने की व्यवस्था हो वैसे किसी भी व्यक्ति को अपने अन्नका भार दूसरों पर डालने का कोई अधिकार नहीं है, यहाँतक कि मुसलमानी कानूनके अनुसार स्त्रीको भी सदा अन्नवस्त्र का अधिकार प्राप्त नहीं होता । स्त्री - साधारण नियम यही है कि पतिको स्त्री का पालनपोषण करना चाहिये, किन्तु पतिका यह उत्तरदायित्व तभी तक बना रहता है जबतक स्त्री उसके उपयोग होता हो । उदाहरण के लिये यदि स्त्री वैवाहिक सम्बन्ध पूरा करनेके अयोग्य हो अर्थात् अल्पवयस्क हो, या आज्ञाकारिणी हो या कानूनके अनुसार, कारण न होनेपर भी पतिको न चाहती हो या उसके अधिकारमें न रहती हो तो उसे का अधिकार नहीं प्राप्त होता । किन्तु यदि ऊपर लिखे कारणों में कोई भी न हो तो स्त्री चाहे निर्धन या धनी, मुसलमान धर्मकी या इतर धर्मकी, उपभुक्त या अनुप्रभुक्त, कैसी भी क्यों न हो उसे अन्नवस्त्र देनेके लिये पति वाध्य होता है । वह स्त्री भविष्य जीवन के लिये का दवाकर सकती है पर व्यतीत समय के अस्त्रका उसे कोई अधिकार, नहीं होता । साथही का यह अधिकार ३२
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जबतक वैवाहिक सम्बन्ध बना रहे, तभी तक रहता भरणपोषण है । इस सम्बन्ध के विच्छेद ( Divorce ) होने
अथवा विधवा हो जानेपर वह अधिकार नष्ट हो जाता है। किंतु, पतिपत्नीको एक दूसरे को छोड़ देने के समय अलग रहकर जो समय व्यतीत करना पड़ता है उस समय में भी अनवस्त्रका अधिकार होता है। मुसलमानी कानूनके अनुसार एक समय चार ही स्त्रियोंसे विवाह करने की आशा है । अतः पाँचवीं या इससे अधिक स्त्री स्त्रीयोंको उत्तराधिकार या नवका अधि कार नहीं होता । पुत्र-पुत्र तथा पुत्रियों के अल्पवयस्क रहने तक [ इण्डियन मेजारिटी एक्ट Indian Majority Act के अनुसार ] उनके पोषणका भार पितापर होता है । पर लड़के के युवा [ वालिंग ] होतेहो यह उत्तरदायित्व समाप्त हो जाता है। हाँ, यदि युवा पुत्र अशक्त हो और पिता धनी हो तो उसपर लड़के के पालन पोषण का भार रहता है। इसके विपरीत छोटे लड़केसे उसकी योग्यताके अनुरूप द्रव्योत्पादक काम कराकर अधिक अमदनी करानेका पिता को अधिकार है। लड़कियोंके विवाह पर्यन्त एवं वैधव्य अथवा तलाक होनेपर पालनपोषणका भार पितापर रहता है। यदि निर्धनता के कारण पिता उनका पालन करनेमें असमर्थ हो और उनके दादा या माता अच्छी स्थितिमें हो तो वे उनके पालनपोषण के जिम्मे दार हैं। उसके अनन्तर यदि पिताकी स्थिति अच्छी हो जाय तब वे उससे इसके सम्बन्ध में खर्च की हुई रकम वसूल कर सकते हैं। कोई मुसलमान यदि अपनी स्त्री अथवा औरस या अनौरस पुत्रोंका पालन करना नहीं चाहता हो तो वह स्त्री,औरस या अमौरस लड़के सिविल प्रोसीजर कोडकी धारा ४८८-४६० के अनुसार अन्न वस्त्र के खर्च की रकम का दावा कर सकते हैं। माता पिता- अपने श्रम से द्रव्य उपार्जन करने में समर्थ होते हुए भी निर्धन माता पिता के पालनपोषणका भार उनकी योग्य संतति पर समान रूपसे रहता है । उदाहरणार्थ:- एक निर्धन पिता का एक लड़का है जिसकी आय तीन हजार रुपये की है तथा एक लड़की भी है जिसकी प्राय पन्द्रह सौ रुपये की है। ऐसी दशा में कानून यही कहता है कि वह लड़का तथा लड़की दोनो ही को उचित है कि अपने माता पिताके पालनके लिये यदि पचास रुपये की आवश्यकता हो तो प्रति मास पचीस-पचीस रुपये दिया करें । |
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