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पृष्ठ:ज्ञानकोश भाग 1.pdf/२७४

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अहिलवाड़
अहिलवाड़
ज्ञानकोश ( अ ) २५१

साथही साथ फन डोपो भी पोतूगीजने स्पेन ! की दे डाला था। पहले तो यहाँ के निवासियोंका ! स्पेन वालोंसे युद्ध हुन्ना किन्तु इसी शर्त पर शीघ्र ही सन्धि हो गई कि उद्देशीय निवासियों में से पाँचके द्वारा टापूका सञ्चालन होता रहे । १६वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में यहाँ स्पेनकी सत्ता फिरसे पूर्व रूपसे स्थापित हो गई।

अहिवाड़ - गुजरात प्रान्त में कान्हिल वाड़ एक प्राचीन राज्य है, जिसका नामकरण उसको राजधानीके नामपर हुआ था । प्राचीन अन्हिलवाड़, प्राधुनिक बड़ौदा के पट्टण या अन्हिलवाड़ पट्टण शहर के किंचित् वायव्य दिशा में स्थित था । इस राज्यका संस्थापक वनराज नामक पुरुष था । कुमार पाल चरित में अन्हिल- चाड़का वर्णन पाया जाता है । उसमें लिखा है कि उसका विस्तार १२ कोस में था । उसमें नगरके ८४ बाजारों, चांदी सोने की टकसालों और राजमहलके वैभव का वर्णन मिलता है । नगर में असंख्य न्यायालय थे, जिनका संचालन सुचारु तथा सुव्यवस्थित रूपसे होता था । सहस्रों मन्दिर तथा पाठशालायें थीं। वृक्षोंकी सघन छाया में वेद विषयक वाद विवाद होता था नगर में प्रतिदिन सहस्रों रूपये की आय थी। उक्त पुस्तक में उपर्युक्त विषयोंके वर्णनके अतिरिक्त कितनी हो दूसरी बातोंका वर्णन अत्यन्त सुन्दर तथा आकर्षक भांतिसे हुना है । (फोबर्स)

इद्रीस नामक विद्वान ने १९५३ ई० में लवाड़का वर्णन इस प्रकार किया है, "नहर- वाल (अन्हिलवाड़ा मुसलमानी (नाम) में बलहार नाम का एक राजा राज करता है। वह बुद्धका उपासक है । उसका मुकुट सोने का है। वह मूध्यवान वस्त्र धारण करता है। उसके पास हाथियोंका एक समूह ही है । राजाकी शक्ति हाथियों पर निर्भर है। सप्ताहमें एक बोर वह वस्त्राभूषण विभूषित सौ सुन्दरियोंके साथ आखेत को निकालता है। मंत्री तथा सेनापति केवल युद्धके अवसर पर ही उसके साथ रहते हैं। अनेक मुसलमान व्यापारी भी नगर में दिखलाई पड़ते हैं । राजा तथा उसके कर्मचारी उनको ससम्मान आश्रय प्रदान करते हैं । हिन्दू स्वभावतः । न्यायप्रिय होते हैं । वे अपनी राजभक्ति तथा सत्यप्रियता के लिये प्रसिद्ध है । वे समृद्धि शाली हैं। उनकी प्रमाणिकता का यह एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि यदि महाजन अपने ऋणीस ऋण वसूल करने की ठान ले तो ऋणी बिना

ऋण चुकाये या महाजन को संतुष्ट किये अपने स्थानसे न हटेगा। लोग अन्न, शाक, या स्वयं भरे हुये जानवरों का मांस खाते हैं। वे अहिंसक हैं । वे गाय और बैलको पूज्य दृष्टिसे देखते हैं ।

प्राचीन अरबी ग्रंथकारोंने भी अन्हिलवाडके वारेमें लिखा है । वे इसको भिन्न भिन्न नामों ब्राम्हल, फाम्हल, काम्हस, कामुहुल, माम्डुल, नहलवार, नहरवाल द्वारा सम्बोधित करते हैं ।

इस्तरखी-- ( सन् ६५१ ) पहला अरबी विद्वान है जिसने इसको 'ग्राम्हल' करके सम्बो धित किया है और इसके बारेमें लिखा है । इसके पहिले किसी भी अरवो भूगोलवेत्ता का ध्यान इस ओर आकर्षित नहीं हुआ है । कदाचित् १० वीं शताब्दीमें इस राज्यने इतनी उन्नति की हो कि दूसरों का ध्यान इसको और प्राकृट हुआ हो । इस्तरखीने इसे हिन्द (गुजरात) का एक नगर कहकर इसका वर्णन किया है । इनि होकल ( सन् ६५८-७६ ) लिखता है कि, 'काम्हल' एक मजबूत तथा बड़ा नगर है। इसमें एक "जामा" है। अलबरूनीका भी ध्यान इस ओर गया था । इद्रीस इसको माल कहकर पुकारता है, और लिखता है कि, "यह हिन्द (गुजरात) तथा सिंधके बीच स्थित हैं;- --तथा घोड़े और ऊंठ रखने वालों का निवास स्थान है ।

११वीं शताब्दी के इतिहासकारोंने, जो महमूद के राज्यकालमें हुये थे, कई बार अन्हिलवाड़ का उल्लेख किया है। फरिश्ता लिखता है कि अन्हिलवाड़की विजयके पश्चात् जब महमूदने सोमनाथ का नाश किया तो उसका विचार था कि वह अन्हिलवाड़ को अपनी राजधानी बनावे क्योंकि यहां पर सोने की खाने थी और सिंहल - द्वीपकी भांति यह भी अपने रत्नोंके लिये प्रसिद्ध था । उसकी इच्छा पूरी न हो सकी; उसके मंत्रियोंने अनेक वाघायें डाली । किन्तु अव भी नगर की दो मसजिद महमूद के प्रेमके स्मारक स्वरूप खड़ी हैं ।

फरिश्ता के वाद नूरउद्दीन मुहम्मद उफी (सन् १२७७ ई०) ने अन्हिलवाड़ का उल्लेख किया है ।उसने अन्हिलवाड़के जयराजा के समयका वर्णन किया है । उक्त इतिहास में यह भी उल्लिखित है कि द्वितीय मूलराजने सन् १९० ई० में मुहम्मद गोरीको पराजित किया। ताजुल मनासिर ने लिखा है कि इसी पराजय का बदला कुतुबुद्दीन ऐबकने सन् १२६७ ई० में लिया । सुल्तान नासिरूद्दिन कवाच ( सन् १२४६-६६ ई०) ने देवल अपने