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सेनापति खातखाँ को नहरवाल भेजा, जहाँसे वह ऋतुलित संपत्ति तथा सहस्त्रों कैदी लाया । सुल्तान अलाउद्दीनने सन् १३०० ई० में गुजरात । जीतने पर, अपने सरदार उलूथखां को सोमनाथ का नाश करने को भेजा । खाँने अलाउद्दीन की आज्ञानुसार सोमनाथका नाश किया और उसकी सबसे बड़ी मूर्ति लाउद्दीन के पास भेज दिया । चाबड़ा घराना – पंचासारका राजा जयशिखर कल्याणके सोलंकी राजासे युद्ध करते हुये मारा गया, तब रूपसुन्दरी प्राणरक्षणार्थ अपने भाईके साथ जंगल में भाग गई। इसके पुत्र बनराजने अनेक वीरता सूचक कार्य किये और चंपानेर तथा अन्हिलवाड़ नामक दो नगर बसाया । अहिलवाड़ का नामकरण उस कर्मचारीके नाम पर हुआ, जिसने इस स्थानको चुनकर यह नगर बसाया । यही वनराज चावड़ा घराने का मूल पुरुष है । एक दूसरी दन्तकथा के स० १८७५ ई० की पुस्तकमें दी हुई है । वनराजका पूर्वज वेणीराजाका पिता बचरोज था । वचराज दीव गढ़पर राज्य करता था। उसके पुत्र वेणीराजाने समुद्रकी शपथ लेकर एक व्यापारीको धोखा दिया था, इसके फलस्वरूप समुद्रने दीवगढ़को बहा दिया । राजाकी गर्भवती स्त्री बहोले भाग | गई। चांदर में रानीने एक पुत्र प्रसव किया। जिसका बनराज नाम पड़ा । इसको अन्हिल गडेरियाने पटुनमें गड़ा हुआ धन दिखलाया । जिससे उसीके नामपर वनराजने 'अन्हिलवाढ़' नामक नगर बसाया । आईने अकबरी में इस वंशके सात राजाओंके नाम दिये हैं- रामराज, जोगराज, खेम या भीम- राज, पिथु, विजय सिंह, रावत सिंह और साँवज सिंह सांवलसिंह सोलंकी घरानेके मूलराज को अपना राज्य दे दिया । स०६४२ ई० में बनराज के गुरु तथा माता प्रयत्न से पंचासर में पारस नाथ का मन्दिर बना जिसकी मूर्ति से यह प्रगट होता है कि राजाने श्रावकको श्राश्रय दिया था। किन्तु पट्टकी दो मूर्तियाँ - उमामहेश्वर तथा गणेशजीको देखने से यह ज्ञात होता है कि उसकी कृपा ब्राहणों पर भी थी। इन मूर्तियोंपर बनराज तथा नगर के स्थापनाका वर्ष सं० ७०२ ई० खुदा हुआ है। फोर्ब्स कहता है कि यहांके प्राचीन राजा उदार थे। उन्होंने कभी किसी मत विशेष के प्रचारकों की हानि नहीं की। यहां शैव तथा जैन प्रचारक शान्तिपूर्वक अपने अपने मतका प्रचार करते थे । |
सोलंकी वंश -- चावड़ा वंशके पश्चात् सोलंकियों ने यहां अपनी राज सत्ता स्थापित की। प्रथम सोलंकी राजा मूलराज था। इस वंशका द्वितीय राजा चामुण्ड था। इसीके राजकाल में गजानीके महमूदने अहितवाड़ पर धावा किया । चामुण्ड को पराजित कर वह सीधा सोमनाथ पर चढ़ दौड़ा, जहाँ वल्लभसेन तथा भीमदेव नामके दोराजपुत्रोंने उसका सामना किया, पर वे भी पराजित हुए। सोमनाथसे लौटकर महमूदने वर्षाके चार मास अन्हिलवाड़ में ही बिताये । महमूदने दुलभको यहांका मांडलिक बनाया। दुदभका वनवाया हुआ दुलभ सरोवर यहाँ वर्तमान है।
सिद्धराज के बारेमें अनेक किंवदन्तियां प्रच लित हैं। इसके पश्चात् कुमारपालने राज्यारोहण किया। यह जैन आचार्य हेमचन्द्रका शिष्य था । यह कहा जाता है कि इसने कुमारबिहार नामक पारसनाथका मन्दिर बनवाया। एक बार स्वप्न में महादेवजीने अम्हिलवाड़ने श्रनेका विचार प्रगट किया, इसलिये उसने एक मन्दिर वहां भी बनवाया । इसीके पुत्र लवणप्रसाद के वंशज बघेल वंशी नामसे गद्दीपर बैठे । भीमदेव द्वितीयके समय में सोलंकी वंशका अन्त हुआ । इसने १९६४ ई० में कुतुबुद्दीन को पराजित कर उसे अजमेरमै रोक रखा। किन्तु श्रागे चलकर कुतुबुद्दीनने नगरके समीप ही उसके सेनापति जीवनरायको पराजित किया, जिस पर भीमदेव राजधानीसे भाग गया । एक बार फिर ११६६ ई० में अपने सब साथियों को एकत्रित करके उसने मुसलमानका सामना किया। मुसलमानाने गुजरातको नष्ट कर हिल- बाड़ पर अधिकार जमाया और 'नहरवाल ? नामसे उसे धुकारने लगे । बाघेलवंश - मुसलमानको शीघ्र ही अन्हिल- वाड़ छोड़ना पड़ा, किन्तु इसकी शक्तिका दिन प्रति दिन ह्रास होता गया । वाघेल राजाओं की स्वतन्त्रता ( १२१४-१३०३ ) लगभग एक शताब्दी |
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अहिलवाड़
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ज्ञानकोश ( अ ) २५२