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क्षीण हो जाती है, अथवा जब किसी विशेष चिन्ता भय अथवा शोकसे शरीर तथा चित्त दोनों ही हृषित रहने लगते हैं, तो उसका प्रभाव मनुष्यके मस्तिष्क पर भी पड़ता है, और यदि वह उसकी सहन-शक्ति से अधिक हुआ तो मनुष्य को यह रोग हो जाता है। ऐसी अवस्थामें मनुष्य विलकुल मूढ़ सा हो जाता है, तथा नाना प्रकार के उपद्रव करने लगता है, चैतन्यावस्थाका बिल्कुल लोप हो जाता है। । वह दांत कटकटाने लगता है, अवसर मिलने पर काट भी खाता है, मुँहसे फेन सथा लार निकलने लगती हैं, भूमिपर हाथ पैर जोर जोर पटकता है, शरीर घूरता है, और धीरे २ उसकी आँखें तथा भौं तन जाती हैं और भयंकर दीख पड़ती हैं। कुछ समय तक यही अवस्था रहनेके पश्चात् दोषका वेग कम पड़ने पर वह शान्त हो जाता है और धीरे-धीरे चैतन्यताको प्राप्त कर लेता है। इस रोग में मुख्य बात यह है कि रोगीको इस बात का ध्यान बिल्कुल नहीं रहता कि वह कहाँ है कौन है, और क्या कर रहा है। मूर्च्छा यह रोग भिन्न है । क्योंकि मूर्च्छा आने पर मनुष्य संज्ञाहीन होकर निश्चेष्ट भी हो जाता हैं और किसी भी क्रिया करने में असमर्थ हो जाता है । इसके वैद्यक शास्त्रमें चार भेद किये गये हैं-- [१] बातजनित, [२] पित्त-जनित [ ३ ] कफ जनित तथा [ ४ ] सन्निपात-जनित | बात, पित्त, कफ, किसो एकके विकारसे भी यह रोग उत्पन्न हो सकता है, अथवा इन तीनोंके दाष [ सन्निपातिक ] से भी हो जाता है । इस रोगके साधारण लक्षण तो पहले ही से अनुभव होने लगते हैं । हृत्कम्पन, जड़ता, भ्रम, आंखो को सामने अँधेरा दिखाई देना, वित्तमें अब राहटका अनुभव, आँखों का ऊपरकी ओर तनते हुए मालूम होना, कानमें भनभनाहट सुनाई देना, बैठे-बैठे पसीना छूटने लगना, इत्यादि क्रियाओंसे रोगीको इसका दौरा होने का पहले ही से अनुभव होने लगता है। अपच, अरुचि, मूर्च्छा, शक्तिहास नोंदवा न आना, शरीर सदैव टूटते रहना, होठ तथा गला सूखते रहना, निद्रामं सदैव भयंकर . स्वप्न देखते रहना, इत्यादि इस राग होनेके सूचक हैं। जिन रोगियों को वात विकारसे यह रोग उत्पन्न हो जाता है, उनका शरीर और विशेषकर पैर काँपने लगता है, बारम्बार मूर्च्छा आने लगती है रोने अथवा हँसने लगता है। उसकी आँखें भयंकर हो जाती हैं, मुखसे फेन निकलता है, शिरको |
हिलाने लगता है, चौपाये पशुओंकी भाँति चलने- का प्रयत्न करता है, दाँत काटता है, उसकी आकृति रुक्ष तथा भयंकर हो जाती है, प्यासकी अधिकता रहती है, इत्यादि इत्यादि । कफ विकार द्वारा रोग उत्पन्न होनेसे कुछ कालके बाद रोगी मूच्छित हो जाता है, और बड़ी देरके बाद वह होशमें आता है। आरम्भमें ही थोड़ा हाथ पैर पटकता है मुखसे लार तथा फेन अधिक निकलती है । आँख, नाखून तथा मुख श्वेत पड़ जाते हैं। रोगीको स्वयं भी सब सफेद देख पड़ता है । सन्नीपातिक अपस्मार सबसे भयंकर समझा जाता है। इसमें उपरोक्त सभी लक्षण देख पड़ते हैं। इसका रोगी कठिनतासे ही साध्य होता है । स्मारका किसी अंश तक एपिलेप्सी (Epi- lepsy) से सादृश्य कह सकते हैं, यद्यपि उचित तो यही कहना होगा कि एपिलेप्सी अपस्मारका एक भेद विशेष है । इसमें बहुधा रोगी आरम्भमें थोड़ी देर तक हाथ पैर पटक कर बेहोश हो जाता है । इस रोग में यह आवश्यक नहीं है कि शरीर के किसी भाग में कोई विकार स्थायी रूपले हो ही । ऐसे छानेक रोग हैं जिनमें शरीर के अभ्यन्तर में कोई विकार न होते हुए केवल क्रियामें ही दोष देख पड़ता है । उन्मादवायु इत्यादि ऐसे ही रोगों- में इसका भी समावेश किया जा सकता है । भीतरसे कोई सम्बन्ध न रहकर केवल व्यापार ही द्वारा यह रोग देख पड़ता । कारण- बहुधा पुरुषों की अपेक्षा यह रोग स्त्रियों- को विशेष रूपसे होता हुआ देखा गया है। कुल रोगियोंके विषयमें यदि ज्ञान प्राप्त किया जाय तो यह पता लगेगा कि इस रोगका प्रादुर्भाव ७५ प्रतिशत या तो वाल्यावस्थामै अथवा युवावस्था के आरम्भ में ही हो जाता है। इस रोगका जड़ से नाश होना बड़ा कठिन है; अतः देखा गया है कि जिनकी एक बार भी हो जाता है वे सम्पूर्ण आयु भर इससे पीड़ित हाते रहते हैं । किन्तु इससे मृत्यु बहुत कम होती हैं । अन्तमें मनुष्य किसी अन्य रोगले पीड़ित होकर ही मरता है। इस रोगका सम्बन्ध वंश अथवा माता-पिता से बहुत सम्बन्ध रखता है । बहुधा ऐसा ही देखा गया हैं कि जिनके माता-पिता को यह रोग था उनक वंशजों में भी किसी-किसी हो जाता है। माता- पिताके अनेक दोषोंसे भी उनके वंशजोंको यह रोग हो जाता है । बहुधा माता-पिता कोई रोग न होने पर भी बाल्यावस्थाकी कुवृत्तियों द्वारा, |
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ज्ञानकोश (अ) २५६