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पृष्ठ:ज्ञानकोश भाग 1.pdf/२८४

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ज्ञानकोश (अ) २६१

तक दौरे होने लगते हैं। यदि दौरा कड़ा हो जाता है तो कुछ दिन तक के लिये रोगीको छुट्टी मिल जाती हैं । मद्य सेवन, अति मैथुन, अति अहार, मानसिक तथा शारीरिक परिश्रमके अधिकतासे दौरे अधिक होने लगते हैं । बहुधा देखा गया है कि रजखला कालमें स्त्रियोंको अधिक दौरे होते हैं ।

उग्रापस्मार - जब रोगी को निरन्तर ही दौरे होते होते ज्वर आने लगता हैं, तो रोग असाध्य सा हो जाता है । उसमें वहुधा मृत्यु भी हो जाती है । देखा गया है कि जिन दिनों दौरे नहीं आते, रोगी हृष्ट पुष्ट तथा बिल्कुल स्वस्थ देख पड़ता है किन्तु जब दौरे जल्दी जल्दी आने लगते हैं, तो रोगीको अवस्था भी बिगड़ने लगती है । उसका स्वभाव चिड़चिड़ा तथा उदास हो जाता है उसका मन तथा हृदय अत्यन्त दुर्लभ होता है। उसकी बुद्धि तथा स्मरण शक्तिका नाश होने लगता है, और कभी कभी तो पागल तक हो जाता हैं । उग्रापस्मारके अतिरिक्त इस रोगले मृत्यु कठिनता से ही होती है, किन्तु दौरे में बहुधा अन्य कारणोंसे रोगीको मृत्यु तक हो जाती है । अचेत होनेके कारण बहुधा पानी में डूब कर ऊँबेसे गिरकर, अगसे जलकर, अथवा ऐसे ही अनेक कारणोंसे रोगी मर जाता है। पहले से कुछ अनुभव न कर सकने के कारण अक्सर चलते चलते, साइकिल पर घूमते घूमते, भोजन बनाते बनाते तक दौरा हो जाता है, जिससे भयंकर परिणाम हो जाता है। ऐसा अनुभव है कि अनुभवेन्द्रिय अथवा मेंदू में कुछ बिकार हो जाने से यह रोग हो जाता है, क्योंकि इसके विकारसे हाथ पैर पटकना संभव हो सकता है । बेहोशी होना भी इसी मतकी पुष्टि करता है ।

'रोग निदान -- यदि रोगीको दौरेकी अवस्था में देखा जाय तो रोगका निदान किया जा सकता है। बिना ध्यान पूर्वक देखे उन्माद अथवा इस रोगके दौरेमें सन्देह हो सकता है । उन्मादके । दौरेमें रोगी किसी एकही क्रियाको बराबर करता रहता है, दौरा भी अधिक स्थायी होता है । यदि रोगीको शारीरिक पीड़ा पहुँचाई जाती है तो वह उसका अनुभव करता है । किन्तु इस रोगके दौरे में दाँत बैठ जाते हैं, चेहरा काला हो जाता है और मनुष्य अनुभव शून्य हो जाता है । बहुधा नीच प्रकृति मनुष्य स्वार्थ साधनके लिये इस प्रकारके ढोंग भी रचते हैं, किन्तु इसका पता बड़ी सुगमता से लग जाता है । आँख इत्यादिको

देखने से, सुनो सुघानेसे अथवा शारीरिक पीड़ा इत्यादि पहुँचानेसे ढोगीका पता सरलताले लग जाता है । रोग अनेक कारण होते हैं, और सबसे पहले इसी बातका निश्चय कर लेना आवश्यक है कि रोगका मुख्य कारण, अथवा दौरे किस प्रकार के बहुधा इसका आरम्भ गतको सोते सोते भी होने लगता है और शुरू में इसका पता भी नहीं रहता। ऐसी अवस्था में यह पूछना चाहिये कि रोगीको सुप्तावस्थामै विछौने पर ही तो मूत्र त्याग तो नहीं होता है ।

साध्यासाध्य विचार - जिसको बाल्यावस्था ही से यह रोग हो जाय और युवा होने तक अच्छा न हो तो फिर अच्छा होने की बहुत कम आशा रह जाती है । यदि रोग बड़े होने पर ही आरंभ हुआ तो अच्छे होनेकी आशा की जा सकती है। यदि दौरे केवल दिन अथवा रात्रिको ही अथवा नियत समय अथवा अवधि पर आते हो, तो भी साध्य हो सकते हैं। जिन रोगियोंको मिश्रित दौरे आते हैं वे दुस्साध्य समझने चाहिये। जिस प्रकारके दोरेमें अनुभवशक्तिका पूर्णतया लोप नहीं हो जाता, वे भी सुसाध्य कहे जा सकते हैं। बहुतसे रोगी केवल नियमित जीवनचर्या करते रहनेसे भी रोगसे छुटकारा पा जाते हैं। दवाई से तो रोगी जड़से बहुत कम बिल्कुल अच्छे हो पाते हैं । यदि खानपान, मैथुन इत्यादिमें तनिक भी अनाचार हुआ तो ऐसे मनुष्यों को रोग फिरसे धर पटकता है ।

औषधीपचार — औषधि से बहुधा तो दौरे में तात्कालिक लाभ पहुँचता है, किन्तु बहुत काल तक नियमित रूपसे चिकित्सा करते रहने से कभी कभी लाभ हो जाता है। इसके रोगियोंके लिये बहुत सी नैसर्गिक बातें भी औषधिके साथ साथ अत्यन्त आवश्यक है । उनको हलका तथा पौष्टिक भोजन व्यवहार में लाना चाहिये । ताजा फलोका अधिक सेवन करना चाहिये । सुर्य प्रकाश तथा शुद्ध वायु उनके लिये नितान्त आवश्यक है । यदि उनके नेत्र, दाँत, पेटमें कोई विकार हो तो उनका उपाय करना चाहिये। मांस मदिरा अथवा कोई भी उत्तेजक पदार्थ व्यवहार में न लाना चाहिये। बहुत अधिक भोजन न करना चाहिये। रात्रिका भोजन सोनेसे कमसे कम तीन घण्टे पहले करना चाहिये । पेट साफ रहना चाहिये । परिश्रम भी नियमित और हलका करना चाहिये । क्रोध, चिन्ता तथा उत्तेजना से