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समाप्त होनेपर जननपेशी उत्पन्न करके रखती है। दूसरी एक जातिका भक्ष्य कुछ विशिष्ट सूक्ष्म जन्तु है । इस प्रकारके सूक्ष्म जन्तु इस जाति के साथ सर्वदा मिलते हैं । ( ५ ) पीत पाणकेश ( Peridineae ) — ये वनस्पतियाँ एक पेशीमय होती हैं और पुच्छविशिष्ट ( Flagellata ) सदृश होती है। ये मीठे पानी में भी मिलते हैं किन्तु खासकर समुद्र में बहुत होती हैं । इनमें दो तन्तु होते हैं । जीवद्रव्य जड़स्थान तथा केन्द्र प्रत्येक पेशी में होता हैं। बहुत सो जातियों में लाल और पीले रंजित द्रव्य होते हैं। किसी २ में चौड़े पंखों के सदृश फैले हुए अवयव होते हैं। इनके कारण ये पानी में तैर सकते हैं। कुछ जातियोंमें रंजित द्रव्योंके बदले रंग हीन द्रव्य होते हैं । ये जातियां परान्न मक्षक होती हैं और उनमें से कुछ का आयुष्य क्रम बिलकुल प्राणियोंके सदृश होता है। कुछ समुद्र में उत्पन्न होने वाली जातियां स्वयं प्रकाशी होती हैं और इस कारण रात के समय समुद्रका पानी चमकता है । उत्पादन पेशी विभागसे होता है। किसी २ में जनन पेशी भी उत्पन्न होती हैं। ( ६ ) संयोगी पाणकेश ( Caniugataae ) -इस जाति की वनस्पतियाँ हरी होती हैं, और मीठे पानी में मिलती हैं । ये एकपेशीमय या तन्तु सरीखी होती हैं । इनका उत्पादन वानस्पतिक या योगसंभव रीति से होता है वानस्पतिक रीति से पेशी विभाग होकर एक पेशी से दो पेशियाँ होती हैं और ये स्वतन्त्ररूप से रहने लगती हैं । योगसंभव उत्पादन में दो पेशियों के लिंगोका संयोग होकर उनसे एक जनन पेशी उत्पन्न होती है और उससे नयी वनस्पति तैयार होती है । एक पेशीमय जाति की डेस्मिड नामकी वनस्पतियाँ मीठे पानी में सर्वत्र मिलती हैं। ये अनेक प्रकार की होती हैं तथा बहुत सुन्दर होती हैं। कुछ गोल होती हैं कुछ ऐसी होती हैं कि मानो दो अर्धवृत्त एक स्थानपर चिपकी हुई हों तो कुछ नक्षत्रोंके सदृश त कुछ चन्द्रकला के सदृश आकार में दिखाई पड़ती हैं। ये स्वतंत्र रह सकती हैं या कई एक पेशियों के एक में मिलने से उनको एक पंक्ति सी दिखाई पड़ती है। प्रत्येक पेशी बराबर २ भागकी होती है । और वे भाग मध्य भागमें चिपके हुए से मालूम पड़ते हैं । प्रत्येक आधे भाग में एक या अधिक हरिद्रव्य के पट्टे होते हैं उसीमें कुछ पिरनाईड़के कभी होते हैं। दोनों अर्धभाग के जोड़पर
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मध्यभागमें केन्द्र होता है। कई एकके पेशी की त्वचापर सुईके समान काँटेके समान होती हैं । कुछ पेशियोंमें दो अर्ध भागोका जोड़ मालूम नहीं पड़ता । (उदाहरणार्थं चन्द्रकला सरीखी पेशियाँ) उत्पादन क्रियामें प्रथम केन्द्रके दो भाग होते हैं, फिर पेशीके बराबर मध्यमपर दो भाग होते हैं । प्रत्येक भागसे एक दूसरा भाग उत्पन्न होता हैं और दो स्वतन्त्र पेशियाँ तैयार होती हैं। योग संभव रोतियें दो पेशियाँ पासपासमें निकलती - हैं, उनसे एक लसदार पदार्थ निकलता है। उनमें वे चिपक जाती हैं और फिर दोनों पेशियाँ उनके आधेके जोड़ पर कूदती हैं उसमें का सर्व जीवद्रव्य बाहर गिरता है । वह जीवद्रव्य फिर और एक जगह पर इकट्ठा होता है तथा उससे एक जननपेशी तैयार होती है । यह जनन पेशी कभी कभी एक विशेष प्रकारकी दिखाई पड़ती है, क्योंकि उस पर कई समय बहुत से कांटे होते हैं । जननपेशी के समीप ही प्रायः रिक्क पेशियोंके चार भाग दिखाई पड़ते हैं । अगती दो पेशियों का केन्द्र उनसे उत्पन्न हुई जननपेशीके स्वीकृत होने तक एकत्र नहीं होते। उससे उत्पन्न हुआ केन्द्र फिर से विभक्त होता है और फिर उससे भी दो छोटे और दो बड़े चार केन्द्र होते हैं । जननपेशी से दो पेशियाँ होती है और हरएक में एक छोटा तथा एक बड़ा केन्द्र होता है कुछ समय के उपरान्त छोटे केन्द्रका नाश हो जाता है। तन्तुमय जातियाँ बहुत सी हैं । शैवालतन्तु और उनकी अनेक जातियाँ मीठे पानी में प्राप्त होती हैं। नदीमें या तालावमें हरा सेवार पानी पर दिखलाई पड़ता है। वह सेवार हाथको मुलायम मालूम पड़ता है और अच्छी तरहसे देखनेपर उसके तन्तु स्पष्ट दिखलाई पड़ते हैं । सूक्ष्म दर्शक यंत्रसे प्रत्येक तन्तु जंजीर सरीखा अनेक पेशियोंसे बना हुआ दिखलाई पड़ता है । इस तन्तुमै सिरा और मूल अलग अलग स्पष्ट दिखलाई नहीं पड़ते हैं। दोनों सिरे समानही पेशियाँ दिखलाई पड़ते हैं। प्रत्येक पेशीमें एक बड़ा केन्द्र और अनेक रंजितद्रव्यमय शरीर होता है । रंजित द्रव्योंके हरे पट्टे फिरकीके मल सूत्र के अनुसार भीतर लपेटे हुए होते हैं । इन पट्टोंमें बीच बीच में कुछ गोल कण होते हैं इनको पिरनॉईड कण कहते हैं । वानस्पतिक उत्पादन पेशी विभाग से होता है। यदि एक तन्तु तोड़ा जाय तो दोनों भागसे भिन्न भिन्न वनस्पतियाँ होती हैं और |
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अपुष्प वनस्पति
अपुष्प वनस्पति
ज्ञानकोश (अ) २६६