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अरण्य समुद्रके तलेमें, जमीनके ऊपर वाले अरण्य के समान ही होते हैं। फ्यूकस (Fucus) नाम की जाति सब समुद्रों में पाई जाती है। बम्बई और कोकणमें समुद्रके किनारेपर मिट्टीके साथ आकर गिरी हुई वन स्पतियोंमें यह बहुधा पाई जाती है। सुंघनी व लाल रंगकी साधारण मोटी; और करीब करीब एक इंच चौड़ी और चिकनी यह होती है। इसपर बहुधा फोड़ेके सदृश कुछ ऊँचा ऊँचा दिखलाई पड़ने लगता है। इन फोड़ोंके नीचे चंबूके सदृश पोली जमीन होती है और उसमें उत्पादक इन्द्रियाँ रहती है। कुछ जातियोंमें एक ही पोली जमीनमें पुरुष और स्त्री जातियोंकी इन्द्रियाँ होती है। कुछ जातियोंमें तो एक वनस्पति पर केवल पुरुष व एकपर केवल स्त्री जातिकी इन्द्रियाँ दिखलाई पड़ती हैं। इन पोली जमीनमें इन्द्रियोत्पादक पेशीके अगल बगल कुछ लम्बे बालोंके सदृश पेशीके तन्तु रहते हैं। इसमें से कुछ उस पोली जमीनके मुखसे गुच्छोंके रूपमें बाहर निकलती है। रेत करंडक (Antheridium) लम्बे रहते हैं और गुच्छेके सदृश एक छोटे डण्ठलपर निकलते हैं। उसके फूटनेपर उसमेंसे बहुत सी रेत पेशियाँ बाहर निकलती हैं। ये पेशियाँ उस वक्त मूल पेशोके अन्दरके आवरण में लिपटी हुई रहती हैं। तब यह भी आवरण फूटता है; और पेशियाँ अलग अलग होकर बाहर निकलती हैं। प्रत्येक पेशी आकारमें लम्बी होती है और उसमें बालके सदृश दो तन्तु रहते हैं। ये तन्तु बराबरके लम्बे होते हैं। प्रत्येक पेशीमें एक लाल विंदू रहता है। रज करंडक (Archigonium) गोल रहता है। प्रत्येक करंडकमें आठ रजपेशियां रहती हैं। उनके चारों तरफ एक पतला वेष्टन रहता है। पेशीके फूटनेपर वह पतला वेष्टन भी फटता है और रजपेशियाँ बाहर निकलती हैं। उसके चारो तरफ रेतपेशियों का एक बड़ा समूह जमा होता है। और उनमें से उसका एकसे संयोग होता है। फिर उसपर त्वचा आती है और वह नीचे तलेमें चली जाती है और फिर अवसर पाकर उससे नई बनस्पति तैयार होती है। कुछ फ्यूगस की जातियोंमें रजपेशियाँ आठ न होकर केवल चार, दो या एकही रहती पेशियाँ होती है किन्तु उसमें की चार छः या। ऐसी अवस्थामें प्रथम तो उसमें आठही सात नष्ट हो जाती हैं और शेष अच्छी रहती |
है। इस जातिकी बहुतसी वनस्पतियाँ अत्यन्त उपयोग की होती है। लामिमेरिया और फ्यूगस इत्यादि किसी किसी की राखसे अद (Iodine) नामका एक पदार्थ निकलता है। दवाइयों तथा रसायन शास्त्रमें इसकी बहुत आवश्यकता पड़ती है। दूसरी भी कुछ जातियाँ औषधधमसंयुक्त होती है। कुछका उपायोग चीनी और जापानी लोग खाने में करते हैं। (११) ताम्र वनस्पति—(Rhodcphyceae) ये वनस्पतियाँ भी समुद्रमें मिलती हैं। इनके आकार भी कई प्रकारके होते हैं। एक वनस्पति बिलकुल सादी अर्थात् तन्तुओं की तरह पेशियों की पंक्ति होती है। यह वहुधा पट्टीकी तरह चौड़ी किन्तु चिपटी; और इसमें कई एक डालियाँ निकली हुई दिखलाई पड़ती है। कुछ बिलकुल पत्तोंके सदृश होती हैं। उनमें डण्ठल बीचमें की शिरायें इत्यादि सभी कुछ रहती हैं। इन सब जातियोंमें जड़के सदृश कुछ तन्तु होते हैं। वे जमीनमें पैठकर ऊपरी भागोंको मजबूतीसे पकड़कर रखते हैं। कुछ वनस्पतियों पर चूने की तह बैठ जाती है और वे मूंगेकी तरह दिखलाई पड़ती हैं। इसमें रंजित द्रव्य खैरके रंगका होता है इसलिये इनका रंग खैर या सुंधनी होता है। पेशियोंमें एक या अधिक केन्द्र हो सकते हैं। अयोगसम्भव उत्पादन इतर जातियों की तरह जननपेशियोंसे होता है किन्तु योगसम्भव उत्पादन तो दूसरों की अपेक्षा बहुत भिन्न होता है। रेत करंडकमें केवल एक ही रेतपेशी उत्पन्न होती है। वह गोल होती है और उसमें तन्तु नहीं होते। इस कारण उसमें चञ्चलता नहीं होती। जल प्रवाहके साथही साथ उसको रज पेशी की ओर जाना पड़ता है। रज करंडक लम्बी होती है और उसके नीचेका भाग एकाध चँबूके सदृश फूला हुआ रहता है। इसमें रजपेशी होती है ऊपरी भाग रेतको पकड़नेकेलिये होता है। रेतके सभीपमें आतेही ऊपरी भागका मुँह फटता है और रेत भीतर आता है। फिर उसमें का द्रव्य रजपेशियोंसे संयोग पाता है। इनसे एकदम नयी वनस्पति उत्पन्न नहीं होती, बल्कि पहले कुछ तन्तु वहीं उत्पन्न होते हैं। इन तन्तुओं पर बहुत सी जननपेशियाँ होती हैं। इन जननपेशियोंसे दूसरे तन्तु होते हैं और इन दूसरे तन्तुओं से नयी वनस्पति उत्पन्न होती है। इस प्रकार एक वनस्पतिसे दूसरी तक स्पष्टं दो पीढ़ियाँ होती हैं। |
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