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पृष्ठ:ज्ञानकोश भाग 1.pdf/३००

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अपुष्प वनस्पति
अपुष्प वनस्पति
ज्ञानकोश (अ) २७७

बढ़ती है। इस पेशीके विभाग होकर अधोभाग के और भी विभाग होते हुए शाखें बढ़ती हैं। ऊपरका भाग पहिलेके इतना बड़ा होकर उसके फिर दो भाग होते हैं। उसमें का ऊपरका हिस्सा फिर बढ़ता है और फिर उसके दो भाग होते हैं। कांड बांस के समान पोले होते हैं।उसकी पेशियों में एक एक केन्द्र होता है। और बहुत से गोल हरिद्रव्य शरीर होते हैं।

जननपेशी से अयोगसंभव उत्पादन कांड शरीरिका में कभी नहीं होता। योगसंभव उत्पादन रेत व रजके सम्बन्धसे होता है। रेतकरंडक गोल और ताबेके रंगका होता है, और बिना यन्त्र के ही आँखों से देख पड़ता है। रजकरंडक लंबे आकार के होते हैं। ये दोनों प्रकार के करंडक मुख्य तनेमें अथवा उसकी डालियों में निकली हुई महीन २ डालियोंके काण्डाग्र पर निकलते हैं। कुछ वनस्पतियोंमें एकमें केवल रेतपेशी और दूसरीमें केवल रजपेशी ही मिलती हैं। प्रायः शेष सभी वनस्पतियों में रेत व रज दोनों एक ही वनस्पति पर मिलते हैं।

रेतकी डिबिया एक थैलीसे उत्पन्न होती है। उस थैलीके आठ भाग होते हैं। फिर हर एक भागके तीन तीन विभाग होते हैं। तब बाहरी आठ कोशों के सम्मिलन से बाहरी पोला गोला तैयार होता है और बाकीसे गोलेके आठों भागों में भीतरसे डठे उत्पन्न होते हैं और उन डंठोंमें लंबी लंबी पट्टियोंकी तरह थैलियाँ निकलती हैं। इन थैलियोंमे रेत कोश रहते हैं। रेतकोश काग (Cork) निकालने के पेंच के समान ऐंठनदार होता है और उसमें बालके समान दो तन्तु रहते हैं।

रजकोश प्रथम खाली रहता है किन्तु शीघ्र ही उसपर पाँच कोशोंका एक वेष्टन चढ़ आता है। ये कोश उसके चारो तरफ लिपट कर उनके सिरे अन्तमें कलगीके समान ऊपर उठ आते हैं। इन सब सिरोंके बीचके छिद्रोंसे रेत भीतर जाता है और फिर उसका संयोग रजसे होता है। रजकोशमें बहुतसे तेलके बिन्दु तथा पिष्टसत्व (Starch) रहता है। रजका संयोग होनेसे उसपर एक मोटी त्वचा आती है और वह वनस्पतिसे अलग होकर गलकर नीचे गिर जाता है। फिर उससे कुछ तन्तु उत्पन्न होते हैं। तत्पश्चात् उन तन्तुओंसे नीचे जड़के समान तन्तु और ऊपर मुख्य डाल तैयार होनेसे काँड शरीरको पूर्ण रूप प्राप्त होता है।

योरपमें एक बनस्पति है जो केवल रजकोश बनाती है। इसमें बिना संयोगके स्वयं ही रजकी गर्भधारणा होती है और इससे नयी बनस्पति उत्पन्न होती है। कुछ बनस्पतियोंमें नीचेके हिस्से में छोटे २ प्याजके सदृश पदार्थ तयार होते हैं। ये प्याज कांडसे ही एक विशिष्ट प्रकारसे बने रहते हैं। उनमें पतली २ डालियाँ भी रहती हैं।

लिंग करंडक धारी—(१) शैवाल वर्गकी (Bryophyta) दो जातियाँ होती हैं—(१) सेवार-सेवार तन्तुसे भिन्न, (२) सेवारके सदृशही पत्थर तथा ईटपर उत्पन्न होने वाली और फैलने वाली बनस्पति। स्थाणुवर्ग और इस वर्गमें मुख्य भेद इनके संयोगेन्द्रिय विषयका हैं। इन वर्गों में जननकोशसे अयोगसंभव उत्पादन होता है। जननकोशोंसे तयार होने वाली वनस्पतियोंमें संयोगिक इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं, और इन इन्द्रियोंके संयोगसे उत्पन्न होने वाली वनस्पतिमें जननकोश उत्पन्न होते हैं। इस प्रकारसे इस वर्ग में अलिंग और लिंग दोनों प्रकारकी पीढियाँ उत्तम प्रकारसे दिखलाई पड़ती हैं। जननकोशके स्पर्श होते ही तत्काल बनस्पति तैयार होती है। किन्तु सेवार में उससे पहले एक तन्तुमय जाल उत्पन्न होता है और उसमें कलियाँ निकलती हैं। इन कलियोंमें सेवार उगता है। यकृतकमें की बहुत सी बनस्पतियों में द्विपाद (Dichotourous) शाखायें निकलती हैं और ये सब शाखायें नीचे तन्तुओंसे जमीनमें चिपक जाती हैं। उच्च यकृतक और सब सेवारोंमें तन्तु और पत्ते अलग २ रहते हैं। तनेमें नीचेकी ओर तन्तु होते हैं। ये तन्तु जड़ का सब काम करते हैं। इस वर्ग में असली जड़ें नहीं रहती। सेवारकी भीतरी बनावट भी बहुत ही सरल प्रकारकी होती है। जब तनेमें (शिराये वाहिनियाँ) रहती हैं तब वे बिल्कुल सरल अर्थात् लम्बे कोशोंके समुदायकी तरह रहती हैं। संयोगिक इन्द्रियाँ सेवारमें पूर्ण रूपसे बढ़ने के बाद लिंग पीढ़ी पर आती है। जो स्थाणुरूप होते हैं उनके ऊपरी भागमें, और जो प्याजके सदृश होते हैं उनकी चोटी पर ये इन्द्रियाँ रहती हैं।

रेतकी डिबियाँ लम्बी, गोल या मुद्लाकार रहती हैं। उनमें एक डंठल रहता है। उनमें बहुतसे कोश होते हैं और प्रत्येकसे दो दो रेत कोश उत्पन्न होते हैं। डिबियोंका ऊपरी भाग फूटकर रेतकोश बाहर निकलते हैं। इनमें किंचित् ऐंठन होती है और बालके सदृश दो २ तन्तु रहते हैं। रजकी डिबियाँ सुराहीके समान रहती हैं।