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पृष्ठ:ज्ञानकोश भाग 1.pdf/३१०

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अपोलो
अपोलो
ज्ञानकोश (अ) २८७

पर्वतमें निम्नलिखित स्तरोंका समावेश होता है—(१) त्रिस्तर (ट्रयासिक), (२) जुरीन (ज्यूरासिक), (३) सीतोपल (केटेसियस), (४) नव प्रभात (एओसोन) तथा (५) नवपूर्व (मिओसीन)! नवप्रभात कालमें एक स्तरपर दूसरे स्तरके चढ़ने से पर्वत श्रेणि तय्यार हुई, समुद्र छिछला हो गया, और काङ्गो मेटेटिक भूपटलके कारण उनकी रचना ऐसी हुई। इस प्रकार स्तरपर स्तर होते जानेसे इनकी ऊँचाई अधिक हो गई और अनेक तालाबों का प्रादुर्भाव हुआ, द्वितीय तथा तृतीय कालीन स्तर समुद्र में डूबगये। इसपर बरफ नहीं जम पाती।

इन प्रदेशों की उन्नतिमें मुख्य दो अड़चने हैं। एक तो इसकी प्राकृतिक रचना दूसरे व्यापारिक साधनोंका अभाव इसकी उन्नतिमें बाधक हो रहे हैं। योरोपीय महायुद्ध के पश्चात् अदनकी खाड़ी से अडिसअबाबा तक रेलवेलाइन बनजाने से, ऐसा विचार किया जाता है कि सम्भवतः व्यापार में कुछ उन्नति हो। स॰ १९२० ई॰ तक तो कुल व्यापार तीस चालीस लाख पौण्डसे आधिक का नहीं हो सका। यहाँ से बाहर भेजीजाने वाली मुख्य वस्तुओंंमे केवल चमड़ा, कहवा और मक्खियों का मोम ही था। सूती वस्त्र यहाँ अन्य देशोंसे बहुत आता था। यहाँ का अधिकाँश व्यापार यूनानी, सीरोयन और अरबी लोगोंके हाथमें है। कृषिमें भी अभी तक विशेष उन्नति नहीं देख पड़ती। खनिज सम्पति भी अभी बेकार पड़ी हुई हैं। जलप्रपातकी असीम शक्ति का, जिसका उपयोग यहाँ बड़ी सरलतासे सम्भव है, उसतक का कोई विशेष लाभ इन प्रदेशोंने नहीं उठाया।

अपोलो—ग्रीस (यूनान) देशमें इस नाम के देवताका किसी समय बड़ा महत्व था। जिस भाँति अपनी प्राकृतिक स्थितिके कारण भारतवर्ष में सूर्यको देवता मानकर उसको पूजनेकी प्रथा चली आती है उसी भाँति अपनी विशेष प्राकृतिक स्थिति के कारण ही ग्रीसमें भी सूर्यका विशेष स्थान होना कोई आश्चर्य नहीं है। अतः उन भावों को व्यक्त करने के लिये ही 'अपोलो' का प्रादुर्भाव हुआ और नाना प्रकारसे उसकी पूजा होने लगी। 'अपोलो' का दो अर्थ हो सकता है; एक तो 'नाश करनेवाला' और दूसरा 'दुःखोंको हरण करनेवाला' दोनो ही अर्थ ग्रीस ऐसे देश में सूर्यके लिये लागू होते हैं। सूर्यप्रकाशके कारण उत्तम फसल, उत्तम आबहना तथा हृदयों में सदा उमंगों का उठना' और उसी सूर्यप्रकाशके कारण कभी कभी भयंकर रोगोंका होना है। अतः 'अपोलो' के रूपमें

ही सूर्यपूजा होती रही। उनका विश्वास था कि भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करने से तथा नियत समय पर उसका उत्सव मनाते रहने से उसकी कभी कोपदृष्टि नहीं होगी। इसकी उत्पत्ति ग्रीसके उत्तम तथा सुहावने समय में हुई थी और उसके कुछ समय बादही उसे रथमें रखकर 'हाईपर-वोरियन' प्रदेश (Hy perborian) में लेगये जिसके कारण शीतकाल का प्रादुर्भाव हुआ क्योंकि सूर्य भी उसके साथही साथ शीतकालमें चला जाता है। ओलम्पियस (Olympius) की देवसभामें उसको मुख्यस्थान दिया जाता था क्योंकि अपनी भविष्य वाणी द्वारा सब वह कुछ सूचित कर सकता था तथा सब विषयोंपर 'प्रकाश' डालता था। अपनी शाक्तिद्वारा दुःख, शोक तथा अज्ञानका अन्धकार दूर करता था।

बहुतसे नगर इसी नामसे बस गये। इन सब का कहना यही है कि उसकी उत्पत्ति उसी नगर में हुई थी। 'लीशिया' देशमें भी इसकी पूजा अति प्राचीन कालसे होती चली आती है। जैन्थस तथा डेलस द्वीपमें इसकी उत्पत्ति बताई जाती है। इस विषयमें अनेक किम्बदन्तियाँ हैं। लेटों (Leto) इसकी माता थी। जब वह जूनो द्वारा पीड़ित होकर भटक रही थी तो उसे 'डेलस' में शरण मिली, और वहाँ जुइस द्वारा (जूपिटर) उसे पुत्र प्राप्त हुआ, जो आजतक 'अपोलोंके नामसे प्रसिद्ध है। इसकी जन्मकथा भी बड़ी मनोरञ्जक है। नौ दिन तक इसकी माता प्रसवपीड़ा से व्याकुल थी। अन्तमें इसका जन्म हुआ जिससे सारा द्वीप प्रकाशित हो उठा। देव प्रिय हंस पक्षि उसद्वीप के चारों ओर सात वार मंडराते रहे। मई मास को ७वाँ ही दिवस भी था। अतः आज भी ७वाँ अंक इस नाते पवित्र तथा शुभ समझा जाता है। उत्पन्न होते ही इसने एक धनुष उठाया और ग्रीसके देवताओं (Oracles) में अपना सिक्का जमानेका निश्चय कर लिया। उसकी इच्छापूर्तिके लिये उसके पिताने बाल बाँधने के लिये अभिमन्त्रित 'मुजक्ष मन्त्रोपदेश तथा गानविद्या में प्रवीणता का शीर्वाद दे, सफेद हंसपक्षि द्वारा खींचे जानेवाले रथपर बैठाकर डेलफी (Delphi) के लिये विदा किया। वे हँस उसे पहले हाइपरबोरियनकी ओर लेगये, जिसका फल यह हुआ कि शीतकाल का प्रादुर्भाष हुआ। वहाँसे वह डेलफी पहुँचा। वहाँपर पहले दूसरे देवोंका महत्व था किन्तु इसका- शीघ्रही प्रधानत्व स्थापित हो गया। असीम साहसके अनेक कार्य किये। इसकी असीम