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पृष्ठ:ज्ञानकोश भाग 1.pdf/३१३

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अप्पा शास्त्री
अप्सरा
ज्ञानकोश (अ) २९०

उसे बुलानेका प्रयत्न किया, किन्तु उस अभिमानिनी वल्लालकुमारीने जैन मन्दिर में प्रवेश करनेसे इन्कार किया अन्तमें ये जैनबस्न, वेश तथा चिन्हका त्याग कर अपने गाँव पहुंचे और अपनी बहनसे क्षमा याचना की। थोड़े ही दिनोंमें ये फिर भले चंगे होगये। अब ये शिवके अनन्य भक्त होगये।

जैनी राजा पल्लवको यह मालुम होनेपर उसने अप्परको अनेक कष्ट दिया किन्तु वह अपने धर्ममें दृढ़ बना रहा। अन्तमें भयभीत होकर राजाने स्वयं शिवदीक्षा इनसे ग्रहण की। तदनन्तर इन्होंने अनेक यात्रा की और अनेक समकालीन प्रसिद्ध साधुओं तथा विद्वानों से भेंट की। उन सबोंने इनका उचित सम्मान किया। तत्कालीन प्रसिद्ध विद्वान् संबन्दर जिसने पाण्ड्यके राजाको जैन धर्मसे फिर स्वधर्म में प्रवेश कराया था, वह इन्हें 'अप्पर' अर्थात् 'पिता' कह कर सम्बोधित करता था। इसी नामसे आगे चलकर यह प्रसिद्ध होगये। इन्होंने अपने भ्रमण कालमें अनेक स्तुति तथा स्तोत्रकी रचना की। अन्तमें यह पुंपुंकलूर में जाकर बस गये। यह अपने पास मन्दिरोंकी घास खोदनेके लिये एक कुदाली सदा रखते थे। इसी कारण आज भी दक्षिण भारतमें पाई जानेवालो इनकी मूर्तियों में 'कुदाली' का चिह्न अंकित देख पड़ता है। यह एक किसान कुलके थे, अतः इनके काव्य तथा लेखोंमें साधारण किसानोंके चरित्रका सुन्दर चित्रण देख पड़ता है। इनकी लिखी हुई लगभग तीन सौ कवितायें अब तक मिलती हैं। अन्य तामिल कवियोंकी भाँति इनकी कवितामें स्थान स्थान पर शिवनृत्यका वर्णन आता है। उस समय दक्षिण भारतमें 'आस्तिक्यवाद' नाम से एक नये ही पंथका प्रादुर्भाव होरहा था। इस पंथमें इनकी कविताओंसे बड़ी सहायता मिलती थी। इनकी कविताओंमें धर्मकी अनेक सुगम तथा रहस्यमय बातें भरी हुई है। अपने गम्भीर और व्यापक भाव इन्होंने अपनी कविताओं द्वारा ही जनसाधारणमें फैलाया था।

अप्पा शास्त्री—इनके विषयमें विशेष कुछ निश्चयपूर्वक पता नहीं हैं। ये एक उत्तम लेखक थे और इनकी लिखी हुई अनेक पुस्तकें आज भी सर्वमान्य समझी जाती हैं। इन्होंने 'लवली-परिणय' तथा 'सारस्वतादर्श' नामक नाटक लिखे। 'अप्पाशास्त्री वादार्थ' तथा 'चिल्लुर वादार्थ' भी इन्हींके लिखे हुए समझे जाते हैं। (Rice. P.

264-268 Oppert. Vol. II. 3492; Burnell, 1209)

अप्पिया-वाया—(Appia Via) यह प्राचीन रोमकी सबसे बड़ी और मुख्य सड़क थी। रोम नगरसे यह ब्राण्डिज़ियम तक चली गई है। यह ३५० मील लम्बी है। इसको पहले पहल ई॰ पू॰ ३१२ में अप्पियस क्लाडियसने बनवाना आरम्भ किया था। किस किस समय इसमें वृद्धि होती गई यह तो निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता यह निश्चय अवश्य है। कि ई॰ पू॰ ३० में यह पूरी होगई। यह पक्की और बड़े बड़े पत्थरोंसे बैठाई हुई है। पटरियों को छोड़कर यह १४ से १८ फीट तक चौड़ी है। इसका वर्णन अनेक प्रसिद्ध लेखकोंने किया है। इसको सबसे उत्तम सड़क मानी है और 'सड़कोंकी रानी' (queen of road) कह कर सम्बोधित किया है। लेखोंसे पता चलता है कि यह ५०० से ५६५ ई॰ तक पूर्णरूपसे अच्छी स्थितिमें थी।

अप्पियस क्लॉडियस—इसको क्लॉडियसके अन्तर्गत लेखमें देखिये।

अप्सरा—अत्यन्त प्राचीन कालसे ही, और प्रायः सभी धर्मों तथा जातियों में ऐसी भावनायें रही हैं कि स्वर्ग में अत्यन्त सुन्दर सुन्दर स्त्रियाँ हैं जो मृत्युके उपरान्त धर्मात्माओंके भोग विलास के लिये वहाँ पर उपस्थित रहती हैं। इस कल्पना का प्रादुर्भाव क्यों और कैसे हुआ अथवा कहाँ से इसकी उत्पत्ति हुई यह कहना तो कठिन है, किन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यह कल्पना सुखलोलुप मनुष्योंको संसार में स्वधर्म तथा कर्त्तव्यपरायण बनाये रखनेके लिये ही की गई होगी। अर्थात् जिस आधार पर स्वर्ग की कल्पना की गई होगी उसी पर यह कल्पना भी स्थित होगी। आज भी बहुत से मनुष्य तथा नर्क के सुख तथा दुःखके भय से ही कितने पुण्य करते हैं, और पाप कर्मोंसे भय खाते हैं। अतः समाज के सुचारु सञ्चालनके लिये ही स्वर्गका निर्माण हुआ होगा, और अप्सरा स्वर्गीय सुखकी पूर्ति के लिये आवश्यक समझी गई होगी। अस्तु, कारण-मिमांसा अथवा इनके अस्तित्व तथा तथ्यता पर विचार करना इस लेखसे परे का और व्यक्तिगत विषय है। अतः, यहाँ पर भारतीय अथवा अन्य देशोंमें जो अप्सरा-सम्बन्धी कल्पना हैं उनका उल्लेख किया जाता है।

भरतीय—इस शब्दका प्रयोग बैदिक साहित्य में भी देख पड़ता। इसीके साथ साथ गान्धर्व