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वन नहीं है। ये अन्य जाति की कन्याओंसे तो विवाह सहर्ष कर लेते हैं, किन्तु अपनी कन्या अन्य जातिमें देनेसे अपनी मान मर्यादा पर आघात हुआ समझते हैं। परदेकी प्रथा यहाँ भी फली होने के कारण बहुधा युवक युवति स्वयं अपना विवाह निश्चय नहीं कर पाते। उनके माता पिताका ही ये कर्त्तव्य होता है कि भली भाँति देख भाल कर अपने पुत्र पुत्रियोंका विवाह करें। कन्याको देखने के लिये किसी स्त्रीको भेज दिया जाता है। जब सब भाँति सन्तोष हो जाता है तब विबाहनिश्चय अर्थात् सगाई (मँगनी) तै की जाती है। इसके बाद दहेज इत्यादिका दोनों और प्रबन्ध हो जानेपर तथा गृहस्थी सम्हालने का पूरा इन्तजाम हो जानेपर इस्लाम धर्मानुसार एक दिन काजी मुल्लाओंके सामने धूमधामसे विवाह सम्पन्न हो जाता है। अमीर तो चार चार तक विवाह करनेके बाद भी घरमें अनेक रखेलियाँ डाले रहते हैं, किन्तु सभ्यताके विकासके साथ साथ यह प्रथा भी कम होती जा रही है। इन लोगों का रहन सहन सीधा सादा होता है। धनके अभावले इन्हे पर्याप्त अन्न भी प्राप्त नहीं होता। साल का अधिक भाग तो केवल ये फल और मेवों पर ही काट देते हैं। धनी लोग गेहूं तथा चावलका प्रयोग करते हैं किन्तु निर्धन तो बहुधा कूटू पर ही निर्वाह करते हैं। ये मांसाहारी होते हैं और बकरे का मांस अधिक व्यवहार में लाते हैं। इन लोगोंकी पोशाक भी सीधी सादी एक सी देख पड़ती है। चौड़ा पैजामा, कमीज या कुरता और चोगा पहनते हैं, और सिर पर साफा लपेटे रहते हैं। आजकल कुछ धनी लोग पाश्चात्य पोशाक भी पहनने लगे हैं। इन लोगोंके घर अभी भी बहुधा वैसे ही पुराने ढङ्गके कच्चे ईटोंके देख पड़ते हैं। ये एक मञ्जिलके बने रहते हैं और मकानके चारों ओर चहार दीवारी खीचीं रहती है। ये आखेटप्रिय तो होते ही हैं साथ ही और भी ताकतके खेलों में भाग लेते हैं। ये कुश्ती और दंगलके बड़े प्रेमी होते हैं। गाँव में छोटे बड़े सभी गोली खेलते हैं। यहाँ अभी भी बड़े बड़े नगरों का छोड़कर पाश्चात्य खेल टेनिस क्रिकेट इत्यादिका अधिक विकास नहीं देख पड़ता। शतरञ्ज का खेल यहाँ घर घर प्रचलित है। यों तो यहाँ के लोगों का स्वास्थ्य अति उत्तम होता है, शारिरिक बल भो पर्याप्त होता है, वृद्धत्व को भी शीघ्र ही नहीं प्राप्त होते, किन्तु स्वास्थ्य तथा स्वच्छता |
(Hygine) के नियमोंसे अनभिज्ञ होने के कारण तथा सभ्यता, विज्ञान इत्यादिमें बहुत पिछड़े होने के कारण अनेक प्रकारके रोग इस देशको सदा ग्रसे रहते हैं। गत वीस वर्षों में तीन बार महामारी का भयंकर प्रकोप हो चुका है। चर्मरोग, आँखों का रोग, गण्डमाला, गरमी इत्यादि यहाँके मुख्य रोग हैं। इस देशकी मुख्य भाषा तो पुश्तो ही मालूम पड़ती है जो कदाचित इण्डो-आर्यन (Indo Aryan) भाषा की एक शाख होगी किन्तु आज कल फारसीका ही अधिक महत्व देख पड़ता है। विदेशियोंके अतिरिक्त वहाँके भी धनी तथा सभ्य कुलोंमें इसीका अधिक व्यवहार देख पड़ता है और यही राज-भाषा भी समझी जाने लगी है। जलालाबादमें लगमानी भाषा बोली जाती है। सरहदी देशों तथा बेलुचिस्तानमें बलूची भाषा बोलते हैं। पुश्तो हेरात अथवा हेलमण्डसे पश्चिम में नहीं देख पड़ती। अफगान देशका प्राचीन काव्य तथा साहित्य पुश्तो भाषामें ही मिलता है। इनमें से कुछ पुस्तके विशेष उल्लेखनीय हैं। पुश्तो भाषाका जो आज कल सबसे पुराना ग्रन्थ मिलता है वह एक इतिहास है। यह (सन् १४१३-१४ ई॰) यूसुफजई लोगोंके एक सरदार शेखअली द्वारा लिखा हुआ है। इसमें इसने अपनी विजय का वर्णन किया है। इसके बाद उसी कुलमें काजूखाँ हो गये थे। उन्होंने भी अपना इतिहास लिखा है। अकबरके शासन कालमें भी बायजद अन्सारी उपनाम पोरे-रोशन तथा प्रसिद्ध अफगानी साधु अखुन्द दर्वेजा ने पुश्तोमें पुस्तके लिखी थीं। इनके साहित्यमें कविताका प्रधानत्व देख पड़ता है। थोड़ी बहुत उच्चकोटि की भी कवितायें देख पड़ती हैं। इनमें अबदुर्रहमान नामक एक बहुत उच्चकोटि का कवि होगया है। दूसरा प्रसिद्ध कवि खुशहालखाँ था। यह औरंगजेब के समय में होगया था। इसके वंश में अनेक अन्य कवि भी हो गये हैं। राज्यसंस्थापक अहमदशाह ने भी अनेक कवितायें लिखी हैं। इसके अतिरिक्त देशीय गाने भी बहुतसे मिलते हैं। प्रधान जातियों तथा स्थानों का इतिहास—यद्यपि भारतवर्ष में सभी अफगानीकों 'पठान' के नामसे सम्बोधित किया जाता है, किन्तु अफगानिस्तान में 'पठान' से उन्हीं का बोध होता है जो 'पुश्तो' भाषा बोलते हैं। 'पठान' का सम्बन्ध 'पक्टियन' शब्दसे बहुत घनिष्ठ मालूम होता है। सम्भव है |
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