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पृष्ठ:ज्ञानकोश भाग 1.pdf/३२१

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अफगानिस्तान
अफगानिस्तान
ज्ञानकोश (अ) २९८

कि जिस 'पक्थ' जाति का उल्लेख ऋग्वेदमें आया है, वे ही इनके पूर्वज हों। प्रसिद्ध इतिहासकार हीरोडोटस का कथन है कि 'पक्टिया' नामका एक स्थान आर्मेनिया प्रान्तमें था। उसने जो कुछ इसका वर्णन किया है उससे पता चलता है कि यह प्रान्त सिंधुनदके सरहद पर था। इसका क्षेत्रफल आधुनिक पुक्तुनखवाके क्षेत्रफलके बराबर ही था। इसको रोह भी कहते हैं और यहाँ के रहने वाले रोहिलो के नामसे प्रसिद्ध हैं। आजकल जो वैक्ट्रियाके नामसे प्रसिद्ध है वह पूर्वकालीन हिन्दू इतिहासका बाहुलीक रहा होगा क्योंकि सिन्धुनद और ऑक्ससके उत्तरी भागको ही बाहूलीक कहा जाता था। पक्टिया प्रान्तसे आजकल जो बोध होता है वह भाग सुलेमान पर्वतकी श्रेणियों तथा सफेद कोहके बीचमें स्थित हैं और यहीं पठानोंका मुख्य स्थान है।

कन्दहार प्राचीन गान्धार देशका ही रूपान्तर है। यह काबुल तथा सिन्धुनदके बीचमें स्थित है। इस देशका भी बहुत पुराना इतिहास देख पड़ता हैं। महाभारत इत्यादिमें अनेक स्थानों पर इसका उल्लेख मिलता है, और भारतवर्षसे इसका घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। पूर्वकालमें यहाँ हिन्दुओं का राज्य था। यहाँपर अन्य अनेक जातियाँ भी रहती थीं। पर्शियन, शक तथा तैमती इनमें मुख्य थीं।

इस्लाम धर्मका प्रचार बढ़ने पर तथा आफगानिस्तान द्वारा जीते जानेपर यहाँके निवासियों ने भी इस्लाम धर्म धीरे-धीरे स्वीकार कर लिया जिससे उनके राष्ट्रियत्व पर गहरा धक्का लगा केवल नाम ही नाम रह गया। अफगानी प्रबल थे। अतः उनकी रीति रस्म तथा सभ्यता का इस देशपर पूरा प्रभाव पड़ा। शादी विवाह होने लगे। अन्तमें इनका कोई अलग अस्तित्व ही नहीं रह गया; और ये भी पक्कें मुसलमान हो गये। अब इनकी गणना 'अफगानियों' में ही की जाती है।

अन्य मुख्य जाति 'दलाज़क' है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि ये लोग सीथियन जातिके होंगे। कदाचित ये पाँचवी तथा छठीं शताब्दी में यहाँ आये होंगे। उसी समय जाटोंसे सम्मिलित होकर इन्होंने कन्दहार पर आक्रमण किया था और वहीं पर बस गये। ये पेशावर तक फैले हुए थे। वहाँके जाट, गूजर के नामसे प्रसिद्ध थे। उनका मुख्य धन्धा जानवरों का पालना तथा

खेती करना ही था। पहले ये भी काफिर समझे जाते थे। इससे यह स्पष्ट है कि ये इस्लाम धर्म को नहीं मानते थे। ये लोग मुहम्मद गजनवीके समय में ही मुसलमान हुए थे। इन्होंने धोरे धीरे पेशावरपर अधिकार कर लिया था। किन्तु थोड़े ही दिनों में इनसे अफगानोंसे युद्ध हुआ।

अन्तमें मिर्जा उलुख बेगके समयमें यूसुफजई तथा महमन्द लोगोंने मिलकर इन्हें पूरा पूरा परास्त कर डाला और पेशावर से भगा दिया। जहाँगीर बादशाह के समयमें भी इनका अस्तित्व पेशावर, पाकली, कच्छ तथा धौलपुर इत्यादि में मिलता है।

इसी समय धीरे धीरे यूसुफजई लोगों का प्रभुत्व बढ़ने लगा था। देशपर देश जीतते जाते थे खाना देशके निवासियोंने इनसे अच्छा मुकाबिला किया। किन्तु अकालके कारण इन लोगों को भी शरण आना पड़ा। धीरे धीरे इन्होंने भी मुसलमानी धर्म ग्रहण किया। इसी समय महमन्द लोगोंने कन्दहार (गान्धार) पर भी आक्रमण कर दिया था। कन्दहार इनके सामने टिक न सका और अन्तमें उसकी पराजय हुई। जेताओंने देशको सत्यानाश कर डाला और बड़ी क्रूरता तथा बर्वरता का बर्ताव किया। फल ये हुआ कि बहुतेरे देश छोड़कर काफिरिस्तान इत्यादि प्रदेशों में जाकर बसे। कुछ काल तक तो इन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा और विजयी इनको 'काफिर' ही कहकर सम्बोधित करते रहे। शनैः शनैः इस्लाम धर्म फैलने लगा और अधिकांश कट्टर मुसलमान हो गये। किन्तु अभी भी यहाँ हिन्दू जाति देख पड़ती है। स्वात का प्रसिद्ध राजा तथा साधु (दरवेश) आखुंद गान्धारी जातिका ही था। अनेक बार इन्होंने अपने खोये हुए अस्तित्वको प्राप्त करने का प्रयत्न किया किन्तु कभी भी इन्हे पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त हुई। विजयी जातियों को यह स्थान बड़ा उत्तम जँचा और वे स्थायी रूपसे यहीं बस गये। किन्तु इससे वहाँकी सभ्यताका पूरा पूरा नाश हो गया। बौद्ध कालमें इस देशकी अवस्था बड़ी उत्तम थी तथा यहाँकी सभ्यता तथा विकास प्रख्यात था। बड़े बड़े नगर बसे हुए थे। सर्वत्र सुख शान्ति का साम्राज्य था। जनता उच्च भावों से परिपूर्ण थी। पुराने लेख, स्मारक तथा खण्डहर जो अब भी पाये जाते हैं इसकी तथ्यताका उत्कृष्ट प्रमाण है। स्वात, वाजावर, वुनर इत्यादि स्थानों में आज भी अनेक चिन्ह पाये जाते हैं।