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यूसुफजई अपने को अफगानी ही कहते हैं किन्तु यह जोसेफके वंशज मालूम होते हैं। धीरे धीरे इनकी संख्या बहुत बढ़ गई। १९वीं शताब्दीके आरम्भमें जब पञ्जाब अँग्रेजोंने जीत लिया तो ये भी उनके वश में आ गये। तबसे इनके देशोंमें भी अनेक सुधार हुए। अब ये लोग सुख शान्तिसे रहते हैं। 'अफ्रीदी' जातिके विषयमें अनेक कल्पनायें हैं। हिरोडोटसके मतानुसार यह अपारीटी जातिके हैं किन्तु आजकलके अफ्रीदी तथा उनमें बड़ा अन्तर देख पड़ता है। अफगानियोंके मतानुसार ये धुरधुष्ट जातिके हैं। बहुत सम्भव है कि पहले चाहे ये बौद्ध धर्मावलम्बी रहे हों चाहे अग्निपूजक, किन्तु अब तो ये अपनेको मुसलमान ही कहते हैं। इस समय इनकी गणना असभ्य तथा जंगली जातिके लोगोंमें ही की जाती हैं। आज कल इनकी अनेक उप-जातियाँ देख पड़ती हैं। खैबरके पास इनकी बहुत बस्ती है। इतिहास—अफगानी अपने को बानीये-इस्मा-इल अर्थात् 'इस्माईलके बंशज' कहते हैं। 'साल' बादशाह (जिसे यह तालूत कहते थे) को ये अपना पूर्वज मानते हैं। आगे चलकर इसी राजा का बंशज 'अफगाना' था जिससे इनके आधुनिक नामकी उत्पत्ति हुई। इस्लामके विख्यात पैगम्बर मुहम्मदके धर्मप्रचारके नवें ही वर्ष क़ैसके नेतृत्वमें इनलोगों का एक दल मदीना भेजा गया। इस दलके लौटनेपर धीरे २ सबोंने इस्लाम धर्मकी दीक्षा ग्रहण की। आधुनिक अफगानी कैस तथा उसके तीन पुत्रों ही से अपना सम्बन्ध जोड़ते हैं। इस कथाका वर्णन देशकी अनेक पुस्तकोंमें मिलता है। सबसे पुरानी पुस्तक जो इस विषय की मिलती है वह सोलहवीं शताब्दीकी है। मेजर रेवर्टीने लिखा है कि बादशाह सुलेमान इन लोगोंके बीच में आकर आधुनिक सुलेमान पर्वत पर स्वयं बसा था। फरिश्ता नामक प्रसिद्ध इतिहासकार का मत है कि पॅराआह जातिके काप्टस लोगोंसे अफगानोंकी उत्पत्ति हुई। बेलोका कथन है कि बिलुचिसका पिता बिलो जो क़ैसके समयसे पहले का है, वह उजबक तथा अफगाना भाई भाई थे। ईसासे ३२० वर्ष पूर्व सेल्युकसने चन्द्रगुप्तको सिन्धुनदके पश्चिमका कुछ भाग दहेजके रूपमें दिया था। इस भागमें भारतवर्षके ही लोग बसे हुए थे। यह काबुलके तरेटी तक फैला हुआ था। लगभग साठ वर्ष बाद इन प्रान्तोंपर ग्रीस का फिर प्रभुत्व देख पड़ता है। इस विषयमें कुछ |
निश्चयपूर्वक कहना तो कठिन है किन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि काश्मीर तक किसी समय यूनानका प्रभुत्व रहा होगा। अब भी ऐसे अनेक चिन्ह तथा अवशेष प्राप्त होते हैं जो ग्रीक सत्ताका प्रमाण हैं। ईसाके समयके लगभग कुशन लोगोंने (यूनान निवासी इन्हें इण्डोलीथियनके नामले पुकारते थे) हिन्दूकुशके दक्षिण तक अपना राज्य फैला लिया था। इनलोगों की सत्ता केवल अफगानिस्तान ही तक नहीं थी, भारतवर्ष में सिन्ध इत्यादि तक इनका प्रभुत्व था। चाहे भारतवर्षका शासन तथा अधिकार इन प्रदेशोंपर पूर्णरूपसे कभी भी न रहा हो किन्तु इतना तो निश्चय है कि बौद्ध धर्म तथा सभ्यताका यहाँ किसो समय पूर्ण विकास रहा होगा। जलालाबाद, पेशावर तथा कावुलके आसपोस आज दिन भी ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं जिससे इस विषयमें कोई भी सन्देहका स्थान नहीं रह जाता। समयके साथ साथ इन प्रदेशोंपर भी बाहरी दलोंके अनेक आक्रमण हुए। इन सबमें प्रसिद्ध कनिष्क ही हुआ है। यह भी ईसाके समयके लगभगका ही है। इसका राज्य भारतवर्ष तक फैला हुआ था। इसका वर्णन ६०० वर्ष बाद आनेवाले चीनी यात्री ह्यूनस्टाँगने विस्तार पूर्वक किया है। इसकी ख्याति अबुरिहानुलवरूनी नामक प्रसिद्ध मुसलमान भूगोलवेत्ता, तत्वज्ञानी तथा यात्रीने ११०० ई॰ में अपनी पुस्तकोंमें वर्णन की है। ह्यूनस्टांगके समय में (६३०-६४५ ई॰) तथा उसके बहुत दिनों बाद तक काबुलमें हिन्दू तथा तुर्क दोनों ही का प्रभुत्व देख पड़ता है। दसवीं शताब्दीके अन्त तक कावुलमें हिन्दू राज्य ही का प्रमाण मिलता है। उसी समय सुबुक्तगीन नामक तुर्कने काबुलको जीता था। इसने ग़ज़नीको अपनी राजधानी नियत की। बारहवीं शताब्दी तक उसीके वंशज राज्य करते रहे। इनके समय में ग़ज़नीकी गणना संसारके मुख्य नगरोंमें की जाती थी। कुछका मत है कि ये अफगान थे। यदि यह सच है तो कह सकते हैं कि ये पहले बादशाह थे जिनको अफगान कह सकते हैं। किन्तु कुछ इतिहासकारोंका मत है कि ये ज़ोहक़ वंशके थे। इसके बाद शाहबुद्दीनग़ोरी देख पड़ता है। इसने तो भारतवर्षपर भी अनेक आक्रमण किये। कुछ समय तक अफगानिस्तानपर खारिज़मके बादशाहका अधिकार था। इसी वंशके जलालु- |
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अफगानिस्तान
अफगानिस्तान
ज्ञानकोश (अ) २९९