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रूसियोंका एक संयुक्त कमीशन नियत हुआ। इसने बड़े परिश्रमके बाद अफगानिस्तानकी उत्तरी सीमा, जो आज तक चली आती है निश्चित की। १८९१ ई॰ तक सम्पूर्ण देशमें शान्ति स्थापित हो गई थी और अमीरकी सत्ता सर्वत्र मानी जाने लगी थी। १८९५ ई॰ में अमीरने अपनी सेनाकी सहायतासे काफिरिस्तान पर विजय प्राप्त की। अफगानिस्तानका एक नकशा बनाया गया जिससे उसकी चौहद्दी निर्धारित होगई। अंग्रेजोंकी ओरसे अमीरको एक बहुत बड़ा कर दिया जाता था। अमीरको भारतसे युद्ध सामग्री तथा हथियार इत्यादि खरीदने का भी अधिकार था। अब अमीरने अपने देशके भिन्न भिन्न दलोंको अलग अलग करके शक्ति हीन बना डाला था। सेनाकी ओर भी इसका विशेष ध्यान था। युरोपियन ढङ्गके अस्त्र शस्त्र एकत्रित किये। सेनाकी शिक्षाके लिये भी युरोपियन नियत किये। नये नये कर लगाये गये तथा सेना बढ़ाई जाने लगीं उनको उचित वेतन दिया जाने लगा। जिन दलों से अमीरको, भय था उनका पूर्ण रूपसे विध्वंस कर डाला गया। इस भाँति अनियन्त्रित सत्ता स्थापित होगई। उसने दण्डका विधान अत्यन्त बटोर रक्खा था। यही कारण था कि वह देशमें पूर्ण रूपसे शान्ति स्थापित कर सका था। वह राज्यके भीतरी व्यवस्थामें किसी परराष्ट्र का हस्ताक्षेप नहीं चाहता था। सत्य तो यह है कि वह अंग्रेजों पर भी पूर्ण विश्वास नहीं करता था, न वह देशके भीतर उनको अधिक हस्ताक्षेप ही करने देना चाहता था। यही कारण था कि व्यापारिक सुविधा इत्यादि हो जाने की सम्भावना होनेपर भी उसने अपने देशमें अंग्रेजोंको रेल तार इत्यादि नहीं लगाने दिया। इतना सब होने पर भी वह रूसियोंके मुकाबले में अंग्रेजोंको अधिक विश्वास की दृष्टिसे देखता था। हबीबुल्लाखाँका राज्यारोहण तथा शासन काल—१९०१ ई॰ में अब्दुलरहमानकी मृत्युके तीसरे दिवस इसका बड़ा तथा सुयोग्य पुत्र हबीबुल्ला खाँ गद्दी पर बैठा। सम्पूर्ण सरदारों धार्मिक-संस्थाओं तथा सेनाने इसे अपना 'अमीर' मानने में कोई आपत्ति नहीं की। लोगोंकी धारणा थी कि जिस सुव्यवस्थाका आरम्भ अब्दुलरहमानने किया था इसका अन्त भी उसीके मृत्युके साथ हो जावेगा क्योंकि इसके सुचारु सञ्चालनकी योग्यता तथा क्षमता किसीमें नहीं देख पड़ती थी किन्तु वास्तवमें यह लोगोंका भ्रम ही रहा। अपने |
पितासे भी अधिक योग्यतासे इसने कार्य आरम्भ किया। लोकप्रियता प्राप्त करनेमें इसने पूर्ण सफलता प्राप्त की। देशमें उसने ओर भी अनेक सुधार किये। परराष्ट्रोंके सम्बन्धमें उसकी नीति भी उसके पिताके ही समान थी। १९०७ ई॰ में उसने भारतकी यात्रा की जिससे उसे अंग्रेजोंकी असीम शक्ति देखनेका अवसर मिला। भविष्यमें चलकर युरोपीय युद्धके समय इसका प्रभाव अत्यन्त हितकर हुआ। अंग्रेजोंसे उसकी गहरी मित्रता होगई थी। १९०७ ई॰ के अगस्त मासमें जो एङ्गलोरशियन सन्धि पत्र लिखा गया था। उसके आधार पर अंग्रेजोंको अफगानिस्तानके भीतरी कार्यों में हस्ताक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं रहा। इसी भाँति रूसियोंने भी अफगानिस्तानको अपने प्रभुत्वकी कक्षाके बाहर मान लिया। १९०८-१४ ई॰ का समय अफगानिस्तान के लिये पूर्ण शान्ति तथा उन्नतिका था। उसी समय अनेक आर्थिक, सैनिक तथा सामाजिक सुधार देशमें हुए। प्रजाको अनेक सुविधायें दी गईं। स्कूल, दवाखाने, तार, टेलीफोन, रेल इत्यादि अनेक उपयोगी कार्य देशमें किये गये। सड़कों इत्यादि का उत्तम प्रबन्ध किया गया। अनेक सड़के बनवाई गईं। हेलमण्ड, काबुल इत्यादि अनेक नदियों में नहरें बनवाकर कृषि विभाग को अनेक सुविधा दी गई। १९११ ई॰ में जब इटली और टर्कीमें युद्ध आरम्भ हुआ तो एक ही धर्मवाले होनेके नाते उन्होंने टर्कीको धनसे समुचित सहायता की। १९१४ ई॰ जब योरपमें महासमर आरम्भ हुआ तो भारत सरकारने अमीरसे भी सहायताकी प्रार्थना की। अमीरने भी वचन दे दिया था कि जब तक अफगानिस्तानकी स्वतन्त्रता पर कोई बाधा नहीं देख पड़ेगी तब तक वह अँग्रेजोंका ही साथ देगा। जब टर्की जर्मनके साथ सम्मिलित होकर अँग्रेजोंके विरुद्ध युद्ध करने पर तत्पर हुआ तो कुछ कुछ आशंका होने लगी थी। किन्तु अँग्रेजोंके समझाने पर कि इस युद्धसे कोई भी धार्मिक सम्बन्ध नहीं है न कोई दल किसीके भी धार्मिक संस्थाओं अथवा पवित्र स्थानोंको ही हानि पहुचावेगा, तब कहीं जाकर अमीरने युद्ध में टर्कीकी सहायता देनेसे हाथ खींचा। सत्य तो यह है कि अमीरकी स्थिति स्वयं ही अत्यन्त विकट हो रही थी। एक ओर तो अपने देशवासियों द्वारा टर्की की सहायता करनेके लिये वाध्य किये जाना, दूसरी ओर रूस जर्मन इत्यादि राजदूतों |
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अफगानिस्तान
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ज्ञानकोश (अ) ३०३