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पृष्ठ:ज्ञानकोश भाग 1.pdf/३२७

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अफगानिस्तान
अफगानिस्तान
ज्ञानकोश (अ) ३०४

का बारम्बार आना इसके लिये बड़ी कठिन समस्या होरही थी। इस अवसर पर इसने भी बड़ी कुटनीतिसे सब कार्योंको सुचारु रूपसे किया। गुप्त रूपसे अँग्रेजोंको बराबर आश्वासन देता रहा तथा निश्चय कराता रहा कि उसकी हार्दिक सहानुभूति उन्हीके साथ है, किन्तु दिखाने के लिये जर्मन इत्यादि देशोंके राजदुतोंका भी अच्छा स्वागत किया। उन दलोंको देशमें रहने भी दिया किन्तु उनपर बड़ी सतर्क दृष्टि रखता था। अन्तमें जब उसे अपने देशवासियों अथवा उन्हींसे कोई विशेष भय नहीं रह गया तो बड़ी बुद्धिमानी से धीरे धीरे उन्हें अपने देशके बाहर कर दिया। निःसन्देह महायुद्ध के समय उसकी नीति प्रशंसनीय रही। युद्ध में स्वयं न तो शामिल हुआ और न किसीसे भी शत्रुता ही मोल ली और वास्तवमें विजेताका ही साथ दिया। इस युद्ध के बाद अपने देश ही में नहीं किन्तु सारे मध्य एशिया में उसका सिक्का जम गया था। जिस समय वह उन्नतिके शिखर पर पहुँच रहा था तथा युद्ध के समाप्त हो जानेसे अनेक सुधारकी धुनमें लगा हुआ था ऐसे ही अनुपयुक्त अवसर पर (२०वीं फरवरी १९१९ ई॰ को) रात्रिको सोते हुए उसकी हत्या कर डाली गई।

इसकी मृत्युसे देश में फिर अशान्ति मच गई। उसके भाई नसरूल्लाखाँने अपनेको जलालाबादमें अमीर घोषित कर दिया। किन्तु अफगानी उसको राजा मानने को तय्यार नहीं हुए। उसका तृतीय पुत्र अमानुल्लाह खाँ इस समय काबुल में था। खजाने तथा शस्त्रागार पर उसी का प्रभुत्व था। जनता भी उसीके साथ थी। अतः उसीको अमीर बनाया गया। जब नसरुल्लाने देखा कि सफलताकी कोई आशा नहीं है तो वह भी उसके शरणमें आगया। अतः अन्तमें अमानुल्लाह ही राज्याधिकारी हुआ।

पहले अमानुल्लाखाँने भारत सरकारसे मित्रता रखने का ही आश्वासन दिया, किन्तु शीघ्र ही उसके विचार बदल गये। पूर्ण स्वतन्त्रताकी घोषणा करके उसने सोवियट (Soviet) सरकारसे मित्रता स्थापित करनेके लिये अपना एक कमीशन मास्को भेजा। केवल इतने ही से वह सन्तुष्ट नहीं हुआ। भारत, मेसोपोटामिया इत्यादि स्थानोमें अंग्रेजोंके विरुद्ध अनेक झूठी-झूठी किबदन्तियाँ उड़ाना आरम्भ कर दी और साथ ही साथ भारत पर आक्रमण करने का भी निश्चय किया। १९१९ ई॰ में भारत पर आक्रमण

करनेके लिये एक अफगानी फौजने कुच भी कर दिया किन्तु अंग्रेजी फौजके सामने ठहर न सकी। उसे पीछे हटना पड़ा। अंग्रेजोंने भी आगे बढ़कर डक्का और स्पिनबदलकका किला जीत लिया। अवतो अमीरको चिन्ता होने लगी और सन्धि की बातचीत चलाई। ८वीं अगस्तको रावल-पिण्डीमें एक अस्थायीं (तात्कालिक) सन्धि-पत्र लिखा गया, जिसके आधार पर युद्ध तत्काल ही बन्द हो गया। स्थायी सन्धि सुविधाके साथ होना निश्चित हुआ। १९१९ ई॰ के मई मासमें अगस्त तक सीमाप्रान्तमें बराबर हमले तथा लूटपाट होती रही। इस सन्धिके बाद ६ मास तक कोई भी बात ठीक ठीक निश्चित न हो सकी। १९२० ई॰ के गर्मीमें मसूरीमें अफगान प्रतिनिधियों तथा सर हेनरी डॉवस में ६ मास तक सन्धिकी बात चीत होती रही। यद्यपि वे निजी तौर पर ही होती रहीं किन्तु अन्तमें उससे समझौतेकी सूरत निकल आई। इसीके आधार पर १९२१ ई॰ के जनवरी मासमें भारत सरकारकी ओरसे कुछ प्रतिनिधि स्थायी सन्धिके लिये भेजे गये। काबुल पहुँच कर एक सन्धिपत्र लिखा गया। इस सन्धिके आधार पर ही अफगानिस्तानको स्वदेशीय तथा परदेशीय विषयों पर पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त हो गई। अब तक जो परराष्ट्रीय विषयक बृटिश नियन्त्रण था वह हटा लिया गया। भारत सरकार जो वार्षिक कर देती थी वह भी बन्द कर दिया गया। अब तक भारतसे युद्ध-सामग्री खरीदने का जो अधिकार अफगानिस्तान को दे रक्खा था उसको भी स्थगित कर दिया गया।

इधर १९२० ई॰ के जनवरी में सोवियट सरकारने अपना कमीशन कावुल भेजा और उसी साल अक्तूबर मासमें सोवियट सरकार द्वारा हस्ताक्षर किया हुआ एक सन्धिपत्र अमीरके पास आया। यह १९२१ ई॰ के नवम्बर मास तक प्रकाशित नहीं हुआ था। इसीके आधार पर सोवियट सरकारने अफगानिस्तान को वार्षिक कर और योग्य अधिकारी देना स्वीकार किया था। उधर १९२० ई॰ के नवम्बरमें तुर्की जनरल कमालपाशा भी अफगानिस्तान आया था। अतः इन सब कारणोंसे अफगानिस्तानमें दो वर्ष तक विविध प्रकारके आन्दोलन होते रहे।

यो तो युरोपीय महासमरके बादसे भारत सरकार तथा अफगानिस्तान का पारस्परिक व्यवहार उत्तम तथा सन्तोषजनक ही रहा है किन्तु बीच-बीच में थोड़ा बहुत झंझट अनेक बार