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सूबेदार नियत किये हुए हैं। इन सूबोंके शासन का पूर्ण भार इन्हीं लोगों पर होता है। इन सूबेदारोंके आधीन अनेक कर्मचारी होते हैं, जो भिन्न भिन्न विभागोंकी देखरेख करते हैं। काजी न्याय करते हैं। कौन्सिल अथवा राजदरबार में तीन श्रेणीके सभासद होते हैं:—(१) सरदार, (२) खाँ तथा (३) मुल्ला। सरदारी वंश परम्परासे चली आती है, अथवा अमीर द्वारा किसी विशेष कार्यसम्पादनके उपलक्षमें प्रदान की जाती है। मुल्ला धर्मके प्रतिनिधि होते हैं। धार्मिक कार्यों में इनसे सहायता ली जाती है। खाँ जनता के प्रतिनिधि होते हैं। कौन्सिल दो प्रकार की होती हैं। एकको तो दरबार शाही कहते हैं। इसमें केवल चुने हुए लोग रहते हैं। प्रत्येक उसमें भाग नहीं ले सकता। दूसरी साधारण सभा होती है। इसके अतिरिक्त एक और सभा होती है। उसे ये 'खिल्वात' कहते हैं। इसमें केवल बड़े बड़े पदाधिकारी रहते हैं। उसको प्रधान मण्डल कह सकते हैं। इसमें अमीर प्रत्येक विभागके मन्त्रिसे उसके कार्यके विषयमें सलाह लेता हैं। बिना अमीरकी इच्छाके सम्मति प्रकट करनेका अधिकार किसीको भी नहीं होता। प्रत्येक मन्त्रि केवल अपने विभाग के विषय में सम्मति सकता है। दूसरे विभागोंके कार्य में हस्ताक्षेप करना अथवा अपनी सम्मति प्रकट करना उनके अधिकारके बाहरकी बात है। अमीर सब विभागोंका सबसे प्रधान समझा जाता है। उसको सब विषयोंमें पूर्ण अधिकार है। उसके पास किसी भी विषयकी अपील की जा सकती है। अमीरका ही निश्चय अन्तिम होता है। पंचायतें तथा काजी इत्यादि भी न्याय सम्पादन के लिये होते हैं। राजनैतिक, चुङ्गी, डाक, सेना, कर इत्यादि अनेक अलग अलग विभाग हैं। इस्लाम धर्मके आधार पर ही यहाँ के कानून बने हुए हैं। किसी समय अमीर केवल काबुल तथा उसके समीपके प्रान्तोंका ही स्वामी समझा जाता था। अन्य अन्य प्रान्तोंके सूवेदार राजघरानेके होते थे और वे स्वतन्त्र समझे जाते थे, किन्तु यह प्रथा अब्दुल-रहमानने उठा दी। राज्यके मुख्य मुख्य दफ्तर इत्यादि काबुल ही में हैं। यहाँकी आय निम्नलिखित करों द्वारा होती है—(१) भूकर (२) आने तथा जानेवाले माल पर चुंगी, (३) ४० जानवरोंकी चराई पर १ जानवर (४) बगीचों पर कर (५) दस्तावेज इत्यादि पर टिकट (६) प्रत्येक व्यक्ति पर लगने- |
वाला कर। इसके अतिरिक्त अब तो और भी अनेक प्रकारके कर लगाकर आमदनी बढ़ानेका प्रयत्न किया जा रहा है। किसी समय भारत सरकारकी ओरसे १८ लाख कर प्रतिवर्ष दिया जाता था। सन् १८५६ ई॰ में राज्यकी आय केवल तीस लाख रुपया थी। इस समय पहलेसे आमदनी बहुत बढ़ गई है। लगभग १३० लाखसे भी अधिककी होगी। सरकारी व्यय बहुत अधिक नहीं रक्खा गया है। जमीनका लगान उसकी उपज में से ही देना पड़ता है। यह लगान सालभर की आय देखकर ही निश्चित की जाती है। सिंचाईकी सुबिधाको देखकर ही लगान लगायी जाती है। जहाँपर सिंचाई के लिये नदियाँ हैं वहाँ १/३ भाग कर लगा दिया गया है। जहाँ सिंचाई में कठिनाई होती है तथा भरने इत्यादिसे सिंचाईकी जाती है वहाँ १/५ भाग कर रक्खा गया है। वर्षा से खींची जानेवाली जमीनों पर १/१० भाग लगान निश्चित किया गया है। वह जमीन जो गैर-सरकारी नहरों द्वारा सींची जाती हैं उसपर भी १/१० भाग लिया जाता है। बड़े बड़े नगरोंके समीप बाग तथा उपवन हैं। उनपर प्रति ३६०० वर्ग गज जमीन पर लगभग ९) के कर देना पड़ता है। लगान वसूलीमें मध्यस्थ अलग ही लाभ उठाना चाहते हैं जिस कारणसे किसानोंको बड़ा कष्ट होता है। देशमें सोनेका सिक्का प्रचलित नहीं है। कुछ काल पूर्व एक टकसाल सरकारी खुली है। उसमें पुराने सिक्केको लेकर नया ढाल देती है। इस विभागमें अभी अनेक सुधारोंकी आवश्यकता है। अफगानिस्तानमें पहले तो सेनाका प्रबन्ध बड़ा खराब था। अमीरके पास बहुत कम सेना रहती थी। प्रत्येक सूबेदारको सेना रखनी पड़ती थी। इसका व्यय उसे स्वयं ही करना पड़ता था। आवश्यकता पड़ने पर वही अमीरकी सहायताकी भेज दी जाती थी। किन्तु इधर कुछ गत वर्षों से यह प्रथा उठा दी गई है। अमीरके कोशसे ही उन्हें वेतन दिया जाता है और वे सब अमीर के ही संरक्षणमें रहती है। पहले से आजकल सेना बढ़ा भी बहुत ली है। अब तो अमीरकी सेना युरोपियन पद्धति के अनुसार शिक्षा प्राप्त कर रही है, शस्त्र इत्यादि भी पर्याप्त हैं। अमानुल्लाखाँने इस ओर विशेष ध्यान दिया था। अफगानी फौज लगभग ५०००० के होगी। ये हेरात, कन्दहार, काबुल, मजारशरीफ जलालाबाद तथा भारतके सीमाप्रान्त पर ही अधिक |
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अफगानिस्तान
अफगानिस्तान
ज्ञानकोश (अ) ३०९