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बारेके बच्चेके पास रहेगा? शिवाजीका यह उत्तर खाँके दिलमें चुभ गया। अफजलखाँने बाएँ हाथसे शिवाजीका सिर अपनी बगलमें जोरसे दबा लिया और दाहिने हाथसे तलवार निकाल कर उनके पेट में भोंकनेका प्रयत्न किया। किन्तु शिवाजी तो पहले ही से सुरक्षित होकर गये थे। उनके शरीर पर कवच तथा सिर पर शिरस्त्राण था। इस कारण खाँका प्रयत्न निष्फल रहा और शिवाजीको कोई हानि न हुई। खाँ दूसरा वार करनेके लिए अपना हाथ ऊपर उठा रहा था कि इतने ही में उपयुक्त अवसर देखकर शिवाजीने बाएँ हाथसे खाँकी कमर कसकर पकड़ ली और उस हाथके बिछुए को खाँके पेट में घुसेड़ दिया। अफजलको स्वप्नमें भी ऐसी शंका नहीं थी। इस वेदनासे वह चिल्ला उठा। वेदनासे वह हतबुद्धि सा हो गया था। शिवाजी का सिर जो उसने कसकर अपने बगलमें दबा रक्खा था जरा ढीला पड़ गया। शिवाजीने इस अवसरसे पूर्ण लाभ उठाया। उन्होंने झट अपना दाहिना हाथ भी छुड़ा लिया और खाँकी पीठमें अपना खंजर भोंक दिया। तब अफजलखाँने दूर हट कर शिवाजीके सिरपर अपनी तलवारका भरपूर वार किया। खाँकी तलवारने शिवाजीका शिरस्त्राण तो अवश्य चूर-चूर कर दिया, परन्तु विशेष चोट सिर पर नहीं भाई और शिवाजी सुरक्षित ही रहे। जिवबा महालकी कमर में दो तलवार लटक रही थीं। उनमेंसे एक तलवार लेकर शिवाजीने खाँके कंधे पर वार किया। इस चोटको अफजलखाँ सम्हाल न सका। वह तुरन्त ही नीचे गिर पड़ा और सहायताके लिये चिल्लाने लगा। खाँकी चिल्लाहट सुनते ही सैयदबन्दा और खाँके दूसरे नौकर सहायताके लिये दौड़कर आए। उन्होंने खाँको पालकीमें रखकर किसी तरह भागनेका पूरा यत्न किया, परन्तु शिवाजी और जिवबा महालके सामनेसे अफजलखाँको ले भागना आसान नहीं था। इन दोनोंने मिलकर सैयद्वन्देकी पूरी खबर ले डाली। शंभाजी कावजी पालकीके पीछे दौड़ता हुआ गया और अफजलखाँका सिर काट ही डाला। इसके बाद शंभाजो कावजीने सिंघा बजाया। उसकी आवाज सुनते हो चारों ओरके जंगल से मराठोंका दलका दल बाहर निकल आया। खाँ के श्रादमी अभी घोड़ों पर चढ़ने भी न पाये थे कि मराठोंकी सेनाने पहुँच कर उन लोगों पर छापा मार दिया। इस युद्ध |
में अफलजकी सम्पूर्ण सेना काम आ गई। बड़ी कठिनतासे अफजलखाँका पुत्र फज़ल मुहम्मद खण्डोजी खोपड़ेकी सहायतासे जान बचाकर भाग गया। इसके बाद जब पन्हालगढ़के घेरेमें से शिवाजी निकल भागे तब इसने उनका पीछा करके अपने पिताका बदला लेनेका विचार किया था किन्तु शिवाजी उसके हाथ न आये। अफजलखाँका सिर शिवाजीने गढ़के ऊपर गड़वा दिया था, और वहीं पर एक बुर्ज बनवा दी थी। इस बुर्जका नाम "अफजल बुर्ज" रख दिया था। अफजलखाँकी जो तलवार शिवाजीके हाथ लग गई थी, वह आज दिन भी शिवाजीके वंशजों के पास सुरक्षित रक्खी हुई है। विजय होनेके बाद अफजलखाँ के डेरेमें से सोने का काम किया हुआ एक अत्यन्त सुन्दर सोनेका खम्भा शिवाजीके हाथ लगा था। वह उन्होंने महावालेश्वरके मन्दिमें दे दिया था। यह अभी तक वहाँ वर्तमान है। शिवाजीने अफजलखाँके शवका पूर्ण संस्कार करा कर बड़े सम्मानके साथ गड़वा दिया था, और उसी स्थानपर एक का भी बनवा दी थी। अफजलखाँका मकबरा गाँवमें गढ़से उतर कर श्राज तक वर्तमान है। अफजलखाँ अपने समय का बड़ा प्रभावशाली व्यक्ति था। वह बीजापुर दरबारका तो एक प्रसिद्ध सरदार था ही, अपने साहस तथा बलके कारण उसका सम्मान मुगल दरबार तकमें यथेष्ट था। अतः शिवाजी द्वारा जो उसपर मराठोंने विजय प्राप्त की थी, इससे उन्हें बड़ा गौरव था तथा अनेक दन्त कथाओं तथा किंबन्दन्तियों द्वारा इस घटनाको बड़ा महत्व दे डाला है। निश्चय पूर्वक तो नहीं कहा जा सकता कि इसमें कहाँ तक तथ्यका अंश है किन्तु एक दन्तकथा इस प्रकार है कि अफजल खाँका इस विषयका पहले ही से पूर्णाभास हो चुका था कि शिवाजीसे युद्ध छिड़ जाने पर उसकी मृत्यु अवश्य होगी। ऐसी अवस्थामें उसे यह भी भय था कि उसकी मृत्युके पश्चात् उसकी स्त्रियोंका सतीत्य भ्रष्ट हो जावेगा। अतः उसने युद्ध पर जानेके पहिले ही अपनो सब स्त्रियोंका बध कर डाला था। कहा जाता है कि इसके ६३ स्त्रियाँ थीं, और उन सब को इसने एक पहाड़परसे एक स्वडूमें ढकेलवा दिया था। युद्धमें विजय होने के बाद शिवाजीने उनके शव वहाँस निकलवा कर उनकी कत्रे बनवा दी थीं। अफजलपुर नामक गाँवके निवासी अब तक उन कब्रोंके चिन्ह वहाँ बताते हैं। सम्भव |
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अफजलखाँ
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ज्ञानकोश (अ) ३१६