पृष्ठ:तिलस्माती मुँदरी.djvu/५२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
४९
तिलिस्माती मुँदरी


खूब लग रही थी क्योंकि एक दूसरे से मिलने की खुशी में एक ने भी शाम का खाना नहीं खाया था-तोता कोतवाल की बीबी के पास उड़ गया और राजा की लड़की ने दयादेई को दीवार का सूराख़ दिखाया और उससे अपने सोने के कमरे की खिड़की पर अक्सर पाने के लिये कहा ताकि वह उसे देख सके और उसकी तरफ इशारे कर सके। इतने में तोता वापस आया और बोला कि "अब चलने का वक्त है”। दयादेई राजा की लड़की के बहुत से बोसे लेकर अपनी मां के पास लौट आई।

ख़िराज जो उस शहर से मांगा गया था इतना ज़ियादा था कि उस के वसूल होने में बहुत रोज़ लग गये, क्योंकि बहुत लोगों ने अपनी क़ीमती चीज़े छिपाने की कोशिश की और राजा के अफ़सरों को तमाम मकानों की तलाशी में बहुत वक्त लगा।

यह सब वक्त राजा की लड़की ने मीनार के ऊपर उस छोटी कोठड़ी ही में अपनी तीनों चिडियाओं के साथ गुज़ारा। वह अक्सर कौओं के ज़रिये से बातों और संदेशे के रुक्के दयादेई के पास भेजा करती थी और दयादेई अपने सोने के कमरे की खिड़की में आ बैठा करती थी जहां कि राजा की लड़की उसे अपनी कोठड़ी की दीवार के छेद से देख सके। और उसमे से अपने हाथ बाहर निकाल कर उंगलियों के इशारे से बात कर सके। वह हाथों को इतना बाहर नहीं निकालती थी कि कोई गैर शख्स़ देख सके, और मीनार पर एक घनी बेल छाई हुई थी जिसके सबब से दयादेई की खिड़की के सिवा और कहीं से वह सूराख नहीं दीख सकता था। तीनों चिड़ियां उसके लिये के दयादेई पास से खाने की चीज़ लाने में भी बहुत कुछ लगी रहती थीं, क्यों दयादेई दो तीन दिन