पृष्ठ:तिलस्माती मुँदरी.djvu/५३

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तिलिस्माती मुँदरी


तक उसके पास फिर नहीं जाने पाई थी, क्योंकि जल्दी जल्दी। जाने से डर था कि कोई जान जायगा। अब की बार वह वहां कुछ रात गुज़र जाने पर गई, क्योंकि चांद रोशन हो रहा था, उसके छिप जाने तक उसे रुका रहना पड़ा। और वहां उनको बातें करते करते करीब करीब सवेरा हो गया, तब दयादेई गई। उस वक्त राजा की लड़की को इतनी नींद आ रही थी कि वह दयादेई के उतर जाने के बाद रेशम की सिड्ढी को ऊपर खींच लेना भूल गई। सुबह को तोता उससे पहले जाग गया और कौओं को कश्मीर की फ़ौज की ख़बरें लाने के लिये भेज कर आप कोतवाल के घर को, लड़की के वास्ते खाना लाने के लिये, उड़ गया। तोते को गये बहुत देर नहीं हुई थी कि राजा की लड़की को आंख किसी के हंसने की आवाज़ से खुल गई। यह आवाज़ उसके नज़दीक ही सुनाई दी और बेचारी के होश उड़ गये जब उसने एक काली सूरत को ज़ीने से निकल कर अपनी तरफ़ आते हुए देखा। लेकिन वह उस सूरत से खूब वाकिफ़ थी, क्योंकि वह उसी लौंडी की थी जिसने उसका ज़िक्र कोतवाल के मकान की तलाशी के वक्त उसे पकड़वाने की ग़रज़ से राजा के अफ़सरों से किया था। वह लौंडी उसकी हमेशा दुश्मन रही थी।

वह उससे तनूज़ के साथ कहने लगी-“हये, हये, तोते- वाली, मैं ने आज तुझे पकड़ लिया! मैं अब तुझे जल्द उन लोगों को सपुर्द कर दूंगी जो तुझे पाकर खुश होंगे और मुझे इनाम देंगे"-और फुरती से अंदर आकर राजा की लड़की को पकड़ लिया और उसकी चद्दर फाड़ के उसके दो टुकड़े कर उनसे उसके हाथ पैर बांध दिये-और यह कहती हुई कि "मुझे यक़ीन है तू मेरे लौट आने तक यहां से भाग न सकेगी" डोरी की सिड्ढी के रास्ते नीचे उतर गई और ज़ोर से उसे