पृष्ठ:तिलस्माती मुँदरी.djvu/५८

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तिलिस्माती मुँदरी


टुकड़ों पर खून के दाग़ पड़ गये जिनको कि उस सिपाही ने देखा था जो मीनार पर लड़की को पकड़ने के लिये चढ़ा था। जैसे ही उसके बन्धन अलग हुए वह मीनार से उतर जाने का कोई वसीला ढूढ़ने लगी, लेकिन कुछ नज़र न आया सिड्ढी को तो लौंडी ले ही गई थी-क्या वह वहां से नीचे ज़मीन पर कूद सकती थी? नहीं, नहीं मीनार बहुत ऊंची थी, कूदना अपनी जान को मौत के हवाले करना था-वह यकायक उल्लू की तरफ़ मुखातिब होकर पुकारने लगी “ऐ उल्लू , ऐ उल्लू , क्या तू मुझे किसी तरकीब से यहां से नीचे पहुंचा सकता है, पेश्तर इसके कि मेरे दुश्मन फिर यहां आ सके?” वह उल्लू बड़ी ज़ात का था जो क़रीब क़रीब उक़ाब या गीध के क़द की होती है, मगर वह इतना मज़बूत न था कि उस लड़की के बोझ को अधर में सम्हाल सके, वरना वह उसे अपनी पीठ पर सवार करा के अकेला ही नीचे उतार देता, इस लिये वह बोला-"ऐ प्यारी लड़की ज़रा ठहर जा, मैं अपनी बीबी को बुला लाऊं जो कि इसी खंडहर में रात के जागने की थकावट दूर करने को इस वक्त सो रही है मैं उम्मेद करता हूं कि मैं और वह दोनों मिल कर तुझ को अपने डैनों के सहारे आसानी से नीचे पहुंचा देंगे"-यों कह कर वह छज्जे पर जा बैठा और वहां से ऐसे ज़ोर से चीखा कि तमाम खंडहर गूंज उठा और थोड़ी ही देर में एक मोटी ताज़ी उल्लन परों को फटफटाती हुई छज्जे पर आन पहुंची और कहने लगी-"क्या मामला है, ऐ शौहर, जो आप ने मुझ को इस वक्त दिन में जगाया है?" उल्लू ने जवाब में अपनी चोंच से उस अंगूठी की तरफ़ इशारा किया जो राजा की बेटी अपनी उंगली में पहने हुए थी, लड़की भी उस वक्त छज्जे पर आ गई थी। वह उससे बोला-"अब वक्त खाना