R तीसरे दिन मोहिनी विहार पहुंची, एक सुन्दर मकान किराये पर लेकर उसमें डेरा डाला, तथा अपने जरूरी काम का कुल सामान बाजार से मगवा कर रख लेने के बाद लालसिह के हाथ एक पुर्जा नरेन्द्रसिंह के पास भेजा। नरेन्द्रसिह यह खबर पाकर कि मोहिनी यहॉ पहुंच गई है, बहुत ही खुश हुए और अपनी इज्जत का खयाल कुछ न करक उसी समय बेखटके उस मकान में चले गए जिसमें मोहिनी ने अपना डेरा जमाया था। हम ऊपर लिखे आये हैं कि जब से तारा और गुलाब को लेकर नरेन्दसिह अपने शहर में आए है,तब से बहुत ही उदास रहा करते है। रम्भा और मोहिनी दोनों ही का इश्क उनके दिल को मसोस रहा था और दोनों ही के सोच में दिन रात उदास रहा करते थे। पर आज ही बहादुरसिह की भेजी हुई चीठी उनके पास पहुंची है जिसकी खुशी में वह फूले नहीं समाते । बहादुरसिह के लिखे मुताबिक चमेला दाई के लडके को कैद कर लिया और अव अमावस्या के पहिले ही हाजीपुर पहुंचने की फिक कर रहे थे कि मोहनी की चीठी लिए हुए लालसिह पहुंचा और एकान्त में मिल कर उनके हाथ में चीठी दी। मोहिनी के आने की खबर पाकर और भी खुश हुए और बेखटक उस हरामजादी के मकान पर चले गए। इनको घर में आते देख मोहिनी खूब ही रग लाई। दौडकर इनके गले से लपट गई और देर तक राती रही। नरेन्द्रसिह ने उसे बहुत समझा-बुझा कर चुप किया और देर तक वातर्चीत करते रहे। मोहिनी ने अपना हाल बनाकर इस तरह से कहा कि उसकी मुहब्बत उनके दिल में और भी ज्यादे हो गई यहा तक कि थोडी देर के लिये बेचारी रमा का भी घ्यान उनके दिल स जाता रहा । बहुत कह-सुन कर आखीर में मोहिनी ने पूछा अब क्या हुक्म होता है ? नरेन्द्रसिह-तुम हमारी हो-हम तुम्हारे हैं, मगर हाथ जोड़कर हम तुमसे पाच सात दिन की छुट्टी मागते हैं इतने दिन तक तुम इसी मकान में रहो हम बहुत जल्द लौट आवेंगे। मोहिनी-सो क्या? कहा जाने का इरादा है ? नरेन्द्र - हाजीपुर। मोहिनी-सो क्यों ? इसके जवाब में नरन्दसिह रम्भा का कुल हाल रत्ती-रत्ती कह गए और अन्त में बोले अव रम्भा हाजीपुर में है और यह सब खयर मुझे उसी मसखरे ने भेजी है। उसने वहा पहुँच कर बडा ही रग बॉधा है। रानी की एक चमेलादाई को उसने मिला लिया है और राजा दौलतसिह के लडके प्रतापसिह से मिल कर उसके दिल में यह बात जमा दी है कि हर अमावस्या को रम्भा के सिर पर उसकी नानी या दादी चुडैल बन कर आती है और उस दिन वह जिसके सिर पर हाथ रख दगी उसक ऊपर भी मूत आ जायेगा। प्रतापसिह के साथ रम्भा की शादी होने वाली थी पर वे लोग अमावस्या की राह देख रहे हैं। अगर उस दिन रम्भा के सिर पर चुडैल आई तो उसे निकाल देंगे और इसमें भी कोई शक नहीं कि उस दिन उसके सिर पर चुडैल अवश्य आदेगी, चमेलादाई बहादुरसिह से मिली हुई है. वह सब बन्दोबस्त कर रक्खेगी। यह हाल सुनते ही मोहिनी का काध चौगुना हो गया मगर उसने अपने को खूब सभाला और दिल का हाल जाहिर होने न दिया। मोहिनी- अगर चमेलादाई बहादुरसिह की मदद न करे तब ? नरेन्द्र- वह झक मारगी और मदद करगी !वहादुरसिह ने धोखा देकर उसे बढय फसा रक्खा है। न मालूम क्या समझा-बुझाकर उसने उसके लड़के को मेरे पास एक चीठी देकर भेज दिया है जिसमें लिखा है कि इस लड़के को कैद करके रखना। अब वह चमेलादाई को जरूर कहेगा कि अगर तू मेरी मदद न करेगी तो तेरा लडका जान से मारा जायेगा और भला चमेलादाई कब कहेगी कि उसका लडका मारा जाय । ' मोहिनी - येशक उस काने ( वहादुरसिह) ने खूब ही धोखा दिया है । नरेन्द्र- इसीलिये आज मै हाजीपुर जाने वाला हूँ। अगर काम निकल गया तो अच्छा ही है, नहीं फौज लेकर राजा दौलतसिह से लडाई करनी पड़गी। मोहिनी-आप जरूर जाइये. जहाँ तक मै समझती हूँ आपका काम अवश्य हो जायगा ईश्वर करे बेचारी रम्भा यहाँ आ जाय, मैं उससे मिल कर बहुत ही खुश होऊगी। नरेन्द - तुम्हारी वहिन गुलाब को मैं तुम्हारे पास भेज देता हूँ। मोहिनी- नहीं नहीं वह आपके घर में है तो मुझे किसी तरह की चिन्ता नहीं है मै इस समय उससे मिला नहीं चाहती क्योकि जब तक आप हाजीपुर से लौट कर न आवेंगे तब तक मै इस शहर में गुप्त भाव से रहूगी। आप भी किसी से मेरी चर्चा न कीजियेगा आपको मेरे सर की कसम है। नरेन्द्र – (हॅस कर ) जैसी तुम्हारी मर्जी । और दो घण्ट तक बातचीत होती रही ! इस समय मोहिनी ने बनावटी मुहब्बत जताने में किसी तरह की कसर रहने नदी। आखिर नरेन्द्रसिह मोहिनी से विदा होकर घर चले आये और बहुत जल्द तैयारी करके वीस-पचीस आदमियों को साथ ले हाजीपुर की तरफ रवाना हो गये। हम ऊपर लिख आये है कि हाजीपुर में राजा दौलतसिह के महल में पहुंच कर एक ओरत ने इस बात का जाहिर नरेन्द्र मोहिनी ११६९ ७४
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