पृष्ठ:देवकीनंदन समग्र.pdf/६५६

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तीनों भाई उसी चबूतरे की तरफ बढे । राजा गोपालसिह के पास भी तिलिस्मी खजर मौजूद था जिसे उन्होंने हाथ में ले लिया और कम्जा दवा कर रोशनी करने के बाद कहा आप दोनों आदी उद्योग करें मैं रोशनी दिखाता है। आगन्द-( आश्चर्य से) आप भी अपने पास तिलिस्मी खजर रखते है ? गोपाल-हा इसे प्राग अपने पास रखता हू और जब तिलिस्म के अन्दर आने की आवश्यकता पड़ती हे तब तो अवश्य ही रखना पड़ता है क्योकि वह लोग एसा करने के लिए लिख गये है। कुँअर इन्द्रजीतसिह और आगन्दसिंह दोनों गाइ बाजे वाले चबूतर के चारों तरफ घुमन ओर उसे ध्यान देकर देने राग। वह च्यूतरा किसी प्रकार की धातु का और चौखुटा बना हुआ था। उसके दो तरफे तो कुछ भी न थामस्वाकी दो तरफ मुटठे लगे हुए थे जिज ह देख इन्द्रजीतसिह ने आनन्दमिह स कहा 'मालूम होता है कि ये दोनों मुठे पकडदार सचिन के लिए बने हुए है। आनए-मै भी यही समझता हूं। इन्द्र- अच्छा पैचो तो सही। आनन्द-(पूरठे का अपनी तरफ सेंच और धुमाकर) यह तो अपनी जगह से हिलता नहीं मालूम होता है कि हम दोना का एक साध उद्योग करना पड़ेगा और इसीलिए इसमें दो मुन्डे बने दर है। इन्त-गा ऐसा ही है अच्छा भी दूसरे मुठे का सीधत है दोनों गामियों का जोर एक साचो लगता चाहिया दोनों भाइयों न आग्ने साना राह कर दोनों पुण्ठो को सुब मजपूनी से पकला और चाय-दाहिने दोनों तरफ रमेला गार वह रित्यतन चूना। इस वाद दानों न उन्हें अपनी तरफ खींचा और कुछ जिवापस कर दोनो इयों ने पमझा कि इसाई अपनी पूरी तादात खर्च करनी पडेगी! आखिर ऐसा ही हुआ अधात दोनों भाइयों के खूब जो दरले पर दोनों गुटठ बिच कर बाहर निकल गये और इसके सापही उस चचतर की एक साफ की दीवार (जिधर मुटठा नहीं 27) पन्ने की तरह घुल गई। जागगनसिंह सुक्षकर उसको अन्दर तिलिस्मी जर की रोशनी दिखाई और कानों गाई उड गौर स सदर दखन लग। कोटी ८, पौकी नजर गई जिस पर ग्रेटी तार की तख्ती के जएर एक चाभी री यो। इन्दजाल अदर की तरफ से बढाकर चौकी खेचना चाहामार यह अपनी आगाम हि तक उन्होंने शव की तरनी और साली उत्पली और पोछे की तरफ हट कर उस खुला पत्ले को बन्द करना चाक्षागार भी सदन हुआ लगतार इसी तर' छोड़ दिया। ताये की सरनी पर दानों भाइयों ने लिए लालूम न कि उस पर बाजे में ताली लगाने की तरकीब लिखी हुई है और ताली यही है तो उस सस्ती सा गोपाल-(इन्द्रजीतरिह से ताली तो आपको मिल ही गई मगर में उचित समझता कि याजी दर लिए नाप लाग यहाँ मे चल पर पानी की कि यार और सुस्ताके याद फिर जो कुछ मुनासिब समझें करे । पद हा मेरी भी यही रहा है इस चन्द जगह में बहुत देर तक रहने से तयीयत घगडा गइ और सर में नक्कर मा 1) आदम-भेरी भी यही हारत है और णास से जोर की माल होती है। गोपाल-वस तो इस सनग यहा से पता चला ही बेहतर है। हम आप लोगों को एक साथ में ले चलता है जहा हर सह का आराम मिलेगा और खाने-पीने का भी सुनीता हो । इद बहुत अच्छा नलिये दिस रास्ते से चलना होगा। गोपाल-उसी राह से जिससे आप आगे है। इन्द्र-तब तो वह कमरा भी आनन्द के देखने में आ जायेगा जिसे मैं स्वय इन्हें दिखाया चाहना था अचनिग राजा गोपालतिक अपने दोनों भाइयों को साथ लिए हुए वहा से रवाना हुए और उस कोठरी में गये जिसमें से आनन्दसिह ने अपने भाई इन्दजीतसिट को आते देखा था। उस जगह इन्द्रजीतसिह ने राजा गोपालसिंह से कहा 'क्या आप इसी गह से यहा आते थे। मुल्ले ता इस दवा की जजीर खजर से काटनी पड़ी थी ! गोपाल-ठीक है मगर हम इस ताले को हाथ लगा कर एक मामूली इशारे से खोल लिया करते थे। आनन्द इस तिलिस्म में जितने ताले है क्या वे सब इशारे ही से खुला करत है या किसी खटके पर है ? गोपाल-सब तो नहीं मगर कई ऐसे ताले है जिनका हाल हमे मालूम है। इतना कह गोपालसिह आग बढे और उस विचित्र कमरे में पहुँचे जिसके बारे में इन्द्रजीतसिह ने आनन्दसिह र्स देवकीनन्दन खत्री समग