यह आवाज कुछ पहिचानी हुई सी जान पडी । देवीसिह ने भी इस आवाज पर गौर किया और उन्हें भी इस यात का शक हुआ कि इस आवाज का में कई दफे सुन चुका है मगर इस बात का काई निश्चय वे दानों नहीं कर सक की यह आवाज किसकी है। दवासिह और भूतनाथ दोनों ही आदनी इस बात को गौर से देखने और जांचने लगे कि यह आवाज किधर स आई या हम उसे किसी तरह दख भी सकत है या नहीं जिसको यह आवाज है। यकायक उनदानों नदेवार में ऊपर की तरफ दो सूराख देख जिनमें आदमी का सर बखूबी जा सकता था। यह सूराख छत से हाथ भर नीचे दृट कर वन हुए थे और हवा आने जाने के लिए बनाए गये थे। दोनो को खयाल हुआ कि इसी सूराख में से आवाज आती है और उसी समय पुन हसन की आवाज आने से इस बात का निश्चय हो गया। फौरन ही दानों के मन में यह बात पैदा हुई कि किसी तरह उस सूराख तक पहुच कर देखा चाहिए कि कुछ दियाई दता है या नहीं मगर इस ढग से कि उस दूसरी तरफ वालों को हमारी इस टिठाई का पता न लग। हम लिख चुके है कि इस कमर में दाचारपाईया विछी हुई थी देवीसिह ने उन दोनों चारपाइयो को उस सूराख तक पहुवाने का जरिया बनाया अर्थात विछावन हटा देने के बाद एक चारपाई देवार के सहारे खडी करके दूसरी चारपाई उसके ऊपर खडी की और कमन्द से दानों के पावे अच्छी तरह मजबूती के साथ वाधकर एक प्रकार की सीढ़ी तैयार की। इसके बाद देवीसिह ने भूतनाथ के कन्ध पर चढकर कन्दील की रोशनी बुझा दी और तब उस चारपाई की अनूठी सीढ़ी पर चढने का विचार किया, उस समय मालूम हुआ कि उस सूराख में से थाडी-थाडी रोशनी भी आ रही है। भूतनाथ 7 नीचे खडे रहकर चारपाई को मजबूती के साथ थामा और बिनवट के सहारे अगूठा अडाते हुए देवीसिह ऊपर चढ गए। व सूराख टेदे अर्थात् दूसरी तरफ को झुकते हुए थे। एक सूराख न गदन डालकर देवीसिह ने देखना शुरू किया। उधर नीच की मजिल में एक बहुत बड़ा कमरा था जिसकी ऊची छत इस कमर की छत के बराबर पहुची हुई थी जिसमें देवीसिंह और मूतनाथ थे। उस कमरे में सजावट की कोई चीज ना थी सिर्फ जमीन पर साफ सुफेद फर्श बिछा हुआ था और दा शमादान जल रहे थे। वहा पर देवीसिह ने दो नकाबपोशों को ऊची गद्दी पर और चार को गद्दी क नाचे यैहे पाया और एक तरफ जिधर कोई मर्द न था अपनी और मूतनाथ की स्त्री को भी देखा। ये लोग आपुस में धीरे- धीरे बातें कर रहे थे इनकी बातें साफ तमझ में नहीं आती थीं, जो कुछ टूटी-फूटी पातें सुनने में आई उनका मतलब यह था कि सुरग का दर्वाजा बन्द करने में भूल हो जाने के समय स भूतनाथ और देवीसिह वहा आ गये अस्तु अब ऐसी भूल ना हानी चाहिए जिसमें यहा तक कोई आ सके। इसी बीच में एक और नकाबपोश आ पहुचा जो इस समय अपने नकाब का उलट कर सिर के उपर फेके हुए था। इस आदमी की सूरत देखते ही देवीसिह ने पहिचान लिया कि भूतनाथ का लड़का तथा कमला का सगा तथा बड़ा भाई हरनामसिह है। देवीसिंह ने अपनी जिन्दगी में हरनामसिह का शायद एक या दा दफे किसी मौके पर देखा होगा इसलिए उसको पहिचान लिया मगर ताज्जुब के साथ ही साथशक बना रहा, अस्तु इस शक का मिटाने के लिए देवीसिह नीचे उतर आय और चारपाई को खुद पकडकर भूतनाथ को उपर चदन और सूराख के अन्दर झांकन के लिए कहा। जब भूतनाथ चारपाई की विनन के सहारे ऊपर चढ गया और उस सूराख में आयकर देखा तो अपने लड़के हरनामसिह को पहिचानकर उसे बडा ही ताज्जुब हुआ और वह बड़े गौर से दयने तथा उन लोगों की बातें सुनने लगा। पाठक ताज्जुर नहीं कि आप इस हरनामसिंह को एक दम ही भूल गये हों क्योंकि जहा तक हमें याद है इसका नाम शायद चन्द्रकान्ता सन्तति के दूसरे भाग को पाचये बयान में आकर रह गया और फिर कहीं इसका जिक्र तक नहीं आया। यह वह हरनामसिह नहीं है जो मायारानी का ऐयार था बल्कि यह कमला का बड़ा भाई तथा खास भूतनाथ का पहिला और असल लडका हरनामसिह है। इसे बहुत दिनों के बाद आज यहा देखकर आप नि सन्देह आश्चर्य करेंगे परन्तु खैर अब हम यह लिखते है कि भूतनाथ न सूराख के अन्दर झाप कर क्या देखा ? भूतनाथ ने दया कि उसका लड़का हरनामसिह गद्दी के ऊपर बैठे हुए दोनो नकाबपोशो के सामने खड़ा है और सदर दबाज की तरफ बड़ गौर से देख रहा है। उसी समय एक आदमी लपेटे हुए मोट कपड़े का बहुत बड़ा लम्बा पुलिन्दा लिए हुए आ पहुचा और इस धुलिन्दे को गद्दी पर रख के खडा हो हाथ जोड़कर भर्राई हुई आवाज में बाला, "कृपानाथ बस ने इसी का दावा भूतनाथ पर करुगा। गधी के नीचे बैठ हुए दा आदमियों ने इशारा पाकर लपेट हुए कपड़े को खोला और तय भूतनाथ ने भी दया कि वह एक बहुत बड़ी और आदमी के कद के बरावर तस्वीर है। उस तस्वीर पर निगाह पडत हो भूतनाथ की अवस्था दिगड गई और वह डर के मारे थर-थरकापने लगा। बहुत कोशिश करने पर भी यह अपन को सम्हाल न सका और उसके मुह से एक चीय की आवाज निकल ही गई अर्थात या चन्द्रकान्ता सन्तति भाग २०
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