पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/१०५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१११ काव्य-कला-कुशलता है। तत्पश्चात्, उल्लिखित हो जाने के कारण पुनः वसंत का नाम न ले, ग्रीष्म का कथन होता है और तत्पश्चात् वर्षा का वर्णन पाता है। इस प्रकार देवजी षट् ऋतुओं का पांडित्य-पूर्ण सन्निवेश करते हैं । प्रियतम की परदेश में मंगलपूर्वक स्थिति विरहिणी को वसंत की ईषत् झलक दिखलाती है । यह झलक कहने-भर को है। वसंत-पंचमी में वसंत की झलक भी ऐसी ही, कहने-भर को, है; नहीं तो उस समय तो शीत ही होता है। सो विरहिणी की वसंत- झलक का वसंत-पंचमी में आरोप ओर उसे भी हैं उत देव बसंत सदा इत हेउत' के बीच में रखना नितांत विदग्धता-पूर्ण है। शारदी पूर्णिमा और अमावस का पास-ही-पास कथन भी मनोहर है। देवजी ने दीपक के भेद, परिवृत्ति-अलंकार, के उदाहरण में उपर्युक्त छंद उद्धृत किया है। (५) अरुन-उदोत सकरुन है अरुन नैन, तरुनी-तरुन-तन तूमत फिरत है; कुज-कुंज केलिकै नवेली, बाल बेलिन सो, नायक पवन बन झूमत फिरत है। अंब-कुल, बकुल समीडि, पीड़ि पाँडरनि, मल्लिकानि मीडि घने घूमत फिरत है: द्रुमन-द्रुमन दल दुमत मधुप "देव', सुमन-सुमन-मुख चूमत फिरत है। पवन की ललित लीला का नैसर्गिक चित्र कितना रमणीय बन पड़ा है, वह व्याख्या करके नष्ट-भ्रष्ट करना हमें अभीष्ट नहीं है। अतः पवन के शीतल, मंद, सुगंध तीनों गुणों को अन्य छंद में सुनिए तथा देखिए कि कवि की दृष्टि कितनी पैनी होती है- सँजोगिन की तू हरै उर-पीर, वियोगिन के सु-धरै उर पीर, कलीनु खिलाय करै मधु-पान, गलीन भरै मधुपान की भीर।