पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/१६

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१६ भूमिका दूसरे वाक्य में एक भी मीलित शब्द नहीं है । टवर्ग-जैसे अक्षरों का भी अभाव है । दीघांत शब्दों के बचाने की भी चेष्टा की गई है। कानों को जो बात अप्रिय है, वह पहले में और जो बात प्रिय है, वह दूसरे में मौजूद है । इस गुणाधिक्य के कारण कवि की जीत अवश्यंभावी है । राजा ने भी अपने निर्णय में कवि ही को जिताया था। निदान शब्द-माधुर्य का यह गुण स्पष्ट है। • अब इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि संसार की जिन भाषाओं में कविता होती है, उनमें भी यह गुण माना जाता है या नहीं । संस्कृत-साहित्य में कविता का अंग खूब भरपूर है । कविता समझानेवाले ग्रंथ भी बहुत हैं। कहना नहीं होगा कि इन ग्रंथों में सर्वत्र ही माधुर्य-गुण का श्रादर है । संस्कृत के कवि अकेले पदों के लालित्य से भी विश्रुत हो गए हैं । दंडी* कवि का नाम लेते ही लोग पहले उनके पद-लालित्य का स्मरण करते हैं । गीत- गोविंद के रचयिता जयदेवजी का भी यही हाल है । कालिदास की प्रसाद-पूर्ण मधुर भाषा का सर्वत्र ही श्रादर है । संस्कृत के समान ही फारसी में भी शब्द-मधुरता पर जोर दिया गया है। अंगरेजी में भी Language of rousic. का कविता पर खासा प्रभाव माना गया है । । भारतीय देशी भाषाओं में से उर्दू में शीरी कलाम कहनेवाले की सर्वत्र प्रशंसा है। बँगला में यह गुण - -

  • उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम् ;

दाण्डिनः पदलालित्यं माघे सन्ति त्रयो गुणाः । + The eur rndeed predominates oner the eye, because it is more immediately affected and because the langnage ofmusic blends more immediately with, and forms a more natural accompanrment to, the variable and indefinite associations of ideas conveyed by words. | Lectures on the English poets-Hazlitti)