पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/२०४

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२१२ देव और विहारी "कल नहीं पड़ती किसी करवट किसी पहलू उसे" जो पद्यांश उन्होंने दोहे के स्पष्टीकरण में रक्खा था, वह देवजी के छंद में अधिक चस्पा होता है या विहारी के दोहे में । देवजी ने भाव- विलास में 'करुण-विरह' को कई प्रकार से कहा है। उनके इस कथन में विशेषता है। उदाहरणार्थ एक छंद यहाँ पर उद्धृत किया जाता है- कालिय काल, महा विष-ज्वाल, जहाँ जल-ज्वाल जरै रजनी-दिन ; ऊरध के अध के उबरै नहीं, जाकी, बयारि बरै तरु ज्यों तिनु । ता फनि की फन-फाँसिन मैं फँदि जाय,फँस्यो, उकस्यो न अजौ छिनु । हा ! ब्रजनाथ, सनाथ करौ, हम होती हैं नाथ) अनाथ तुम्हें बिनु । देव कृष्ण को विषधर काली के दह में कदा सुनकर गोपियों का विलाप कैसा करुण है ! व्रजनाथ से पुनः सम्मिलन की आशा रख- कर उनसे सनाथ करने की प्रार्थनी कितनी हृदय-द्राविनी है! काली-दह का कैसा रोमांचकारी वर्णन है ! अनुप्रास और माधुर्य कैसे खिल उठे हैं ! सौहार्द-भक्ति का विमल श्रादर्श कितना मनोमोहक है ! विस्तार भय से यहाँ हम अर्थालंकारों का उल्लेख नहीं करेंगे। पर वास्तव में इस छंद में एक दर्जन से कम अलंकार न ठहरेंगे। स्वभावोनि मुख्य है। ३-मान '", "प्रियापराध-जनित प्रेम-प्रयुक्त कोप को मान कहते हैं।" वह लघु, मध्यम और गुरु तीन प्रकार का होता है । ( रसवाटिका, पृष्ठ ७६) दोऊ अधिकाई -सरे, एक मो गहराइ; कौन मना१ को मनै ? मानै मत ठहराइ ।