पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/२३३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


तुलना २४१. वातायन-द्वार पर विशेष वायु-संचार की संभावना से फिरकी की उपस्थिति जैसी स्वाभाविक है, उसे पाठक स्वयं विचार सकते हैं। अनुप्रास-चमत्कार एवं अन्य काव्य-गुणों में सवैया दोहे से उत्कृष्ट है। मनमोहन की मूर्ति 'मनमोहनी' की गई है, यह परिकरांकुर का रूप है। 'थिर है थिरकी' में असंगति-अलंकार है । नाममात्र सुनने से उरोजों का उढा होना चंचलातिशयोक्ति अलंकार का रूप है । उपमा की बहार तो दोनों छंदों में ही समान है। नई लगन के वश विहारी- बाल की नायिका इँच जाती है और उसमें कुल-संकोचमात्र की बजा है, पर देवजी की नायिका में स्वाभाविक लजा है। इसी लज्जा- वश वह झरोखे से ही झाँककर अपना मनोरथ सिद्ध नहीं कर पाती। देवजी की नायिका विशेष लजावती है । उसमें मुग्धत्व भी विशेष है। (३) पलन पीक, अंजन अधर, दिए महावर माल, आजु मिले सो भली करी; भले बने हो लाल ! विहारी भारे हौ, भूरि भुराई-भरे अरु भॉतिन-माँतिन के मन भाए ; भाग बड़ो बरू मामती को, जेहि मामते लै रॅग-मौन बसाए ! मेष भलोई भली बिध सों करि, भूलि परे किधी काहू भुलाए ? लाल मले हौ, भली सिख दीन्हीं; भली भई आजु, मले बनि आए! सापराधी नायक के प्रति खंडिता नायिका की अपर्व भर्त्सना दोनों ही छंदों में समान हैं । देवजी की खंडिता कुछ विशेष वाक्चतुरा समझ पड़ती है । विहारीलाल की नायिका देखते- न-देखते तुरंत कह उठती है-"पलन पीक, अंजन अधर,दिए महा- वर भाल" । नायक का सापराधत्व स्थापित करने में वह क्षणमात्र का भी विलंब नहीं होने देती । पर देवजी की नायिका उस चतुराई का श्राश्रय लेती है, जिससे अपराधी को पद-पद पर लजित होना