पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/६५

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देव और विहारी का वर्णन किया है। यह नेचर-निरीक्षण में सोलहों आने भूल है। जो वस्तु जिस समय होती ही नहीं, उसका उस समय वर्णन कैसा ? यदि कवि ऐसा वर्णन करता है, तो यह उसकी निरंकुशता है। नवरत्नकारों ने केवल "नेचर-निरीक्षण" में भूल बतलाई है। इस कारण कवि-संप्रदाय से यदि संस्कृत कवियों के कुछ ऐसे वर्णन मिलें भी, जिनसे चक्रवाक का वर्षा में होना पाया जाय, तो भी नेचर-निरीक्षण की भूल से विहारीलाल नहीं बचते । कवि-जगत् भले ही उनका दोष क्षमा कर दे, पर उनकी प्रकृति-निरीक्षण-संबं- धिनी भूल ज्यों-की-त्यों बनी रहती है । फिर संस्कृत-साहित्य में भी तो यह कवि-संप्रदाय सर्व-सम्मत नहीं है । अपवाद-स्वरूप फुटकर उदाहरसों से व्यापक नियम स्थापित नहीं किया जा सकता। एक बात और है । चक्रवाक हंस-जाति का पक्षी है । सो इसके वर्षा-काल में न पाए जाने का प्रमाण संस्कृत-साहित्य से भी दिया जा सकता है । हनुमन्नाटक में हंसों का वर्षा में न होना स्वयं रामचंद्रजी कहते हैं- ___ "येऽपि त्वदमनानुकारिगतयस्ते राजहंसा गताः" कविवर केशवदास ने कविप्रिया में वर्षा में वर्णन करनेवाली वस्तुओं की एक सूची दी है। उसमें भी चक्रवाक का वर्णन नहीं है; यथा- बरषा बरनहुँ सघन बक, चातक, दादुर, मोर, केतकि, कंज, कदंब, जल, सौदामिनि धन घोर । भाषा के कवियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वर्षा-काल में चक्रवाक नहीं होते । कविकुल-मुकुट श्रीमहात्मा तुलसीदासजी किष्किंधा-कांड में वर्षा-वर्णन करते समय कहते हैं- 'देखिय चक्रवाक-खग नाही, कलिहि पाय जिमि धर्म पराहीं ।