पृष्ठ:द्विवेदीयुग के साहित्यकारों के कुछ पत्र.djvu/८०

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द्विवेदी जी के पत्र पं० श्रीराम शर्मा के नाम शुभैषी महावीरप्रसाद द्विवेदी (पं० श्रीरामशर्मा जी को हाई स्कूल की हेडमास्टरी इसलिये छोड़नी पड़ी थी कि स्वाभिमान की रक्षा के लिये उन्होंने एक डिप्टी कलक्टर को अदालत में ठोंक दिया। देशी रियासत का मामला था। डिप्टी कलक्टर ने गाली दी थी। आवेश में आकर शर्मा जी ने डिप्टी कलक्टर और उसके पेशकार को खूब पीटा। परिणाम स्वरूप उन्हें नौकरी से तो हाथ धोने ही पड़े, बड़े बड़े कानूंनदां लोगों और परिचित व्यक्तियों की नाराजगी का शिकार भी बनना पड़ा। चारों ओर से दुत्कारे जाने पर शर्मा जी ने द्विवेदी जी को लिखा। उसका यह उत्तर है।) (२) दौलतपुर (रायबरेली) २१-९-३३ नमोनमः चिट्ठी मिली। 'सुधा' वालों ने मेरी सम्मति मांगी। उपाय भर में किसी को निराश नहीं करता। मैंने दे दी। उसका उन्होंने दुरुपयोग किया। दिल पर मेरे कड़ी चोट लगी पर क्या करूँ । जो अन्याय ही को न्याय समझता हो, उससे क्या आशा? चुप हो रहा। हजरत फिर मिलें, तो ज़रा शरमिन्दा तो करना। ___ जगन्नाथ के कष्टों की कथा पढ़कर में रो चुका हूं। मां की ममता पर मुझे मेरी मां याद आ चुकी है। अब न पढूंगा। उसमें जो चित्र जमींदारों आदि का है, वह सजीव है। यही दशा इस तरफ भी है। खूब लिखिए—कोरियों, चमारों आदि गरीबों के चरित लिखकर आत्मा को उन्नत कीजिए। बड़े-बड़े के चरित लिखने वाले तो बहुत हैं, दीनदुखियों के जीवन का खाका खीचनेवाले कोई भी नहीं । अंग- रेजों के मुल्क में तो कीट-पतंगों और पशु-पक्षियों तक के जीवन-चरित निकलते हैं। __महाराज टीकमगढ़ हिंदी की उन्नति के लिए कुछ रुपया देनेवाले हैं। उस दिन मैंने पंडित बनारसीदास से कहा था कि आप इस रुपए के एक अंश से प्रसिद्ध- प्रसिद्ध देहातियों के जीवन-चरित लिखाइए। कृपापात्र महावीरप्रसाद द्विवेदी