" कमजोर होने, शिक्षा से शारीरिक श्रम के गायब होते चले जाने जैसी समस्याएं उत्पन्न हो गयी हैं। ऐसे में नई शिक्षा नीति को लेकर शिक्षा जगत के लोगों में काफी उत्सुकता है। देखना होगा कि इसमें शिक्षा की इन समस्याओं के समाधान के लिए क्या-क्या किया गया है ? राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2019 के प्रारूप की खास बातें तथा इस नीति के तहत शिक्षा के क्षेत्र में उठाये जाने वाले भावी कदम निम्नलिखित हैं- 1- प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग (एनइसी) का गठन होगा । 2- मानव संसाधन मंत्रालय को शिक्षा मंत्रालय कहा जाएगा। 3- प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा को पूरी तरह से स्कूल शिक्षा के साथ एकीकृत किया जाएगा। बात कही गयी है तथा इनकी शिक्षा के लिए स्थानीय कुशल लोगों को विद्यालय में आमंत्रित किया जायेगा । । 14- माध्यम भाषा के रूप में अंग्रेजी की अनिवार्यता के बजाय द्विभाषिकता की बात कही गई है। 15- प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा के माध्यम से शिक्षण की बात है। घर और स्कूल की भाषा अलग है तो द्विभाषिकता की बात कही गयी है । बहुभाषिकता को प्राथमिकता देने का इरादा व्यक्त किया गया । 16- त्रिभाषा फार्मूले के तहत उत्तर भारत में दक्षिण की किसी एक भाषा को अनिवार्य रूप से पढ़ने का प्रस्ताव है। 17- निजी स्कूल अपने नाम के साथ 'पब्लिक' नहीं जोड़ सकेंगे। इसे उन्हें बदलना होगा । 18- निजी शिक्षा मुनाफे नहीं लोककल्याण के लिए होगी। वे मनमाना शुल्क नहीं बढ़ा सकेंगे । 4- शिक्षा का अधिकार कानून का दायरा पूर्व प्राथमिक से लेकर 19- बीएड चार वर्ष का होगा । द्विवर्षीय बीएड को समाप्त किया जायेगा । कक्षा 12 तक होगा। 20- शिक्षक को सेवाकाल में 5 एसीपी देने का प्रस्ताव है। । । 5- प्रत्येक राज्य में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में राज्य शिक्षा आयोग 21 - पुस्तकालयों को जीवंत करने की बात है। समूह में पठन, कहानी का गठन होगा । 6- स्कूल कॉम्प्लेक्स का गठन होगा जहां प्री-प्राइमरी से कक्षा 12 तक के स्कूल होंगे। 7- कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का एकीकरण होगा । 8- स्कूली शिक्षा के वर्षों का निम्नवत पुनर्गठन किया जायेगा- पूर्व प्राथमिक शिक्षा - 3 वर्ष प्री प्राइमरी तथा कक्षा 1-2 प्राइमरी (कुल 5 वर्ष, उम्र 3 से 8 वर्ष) प्राथमिक शिक्षा-कक्षा 3 से 5 (कुल 3 वर्ष, उम्र 8 से 11 वर्ष) उच्च प्राथमिक कक्षा 6 से 8 (कुल 3 वर्ष, उम्र 11 से 14 वर्ष) माध्यमिक स्तर- कक्षा 9 से 12 (कुल 4 वर्ष, उम्र 14 से 18 वर्ष) यानी 5+3+3+4 9- राज्य की समग्र शिक्षा व्यवस्था के नियामक के तौर पर राज्य स्कूल नियामक प्राधिकरण (एसएसआरए) स्थापित किया जायेगा । सरकारी तथा निजी दोनों स्कूलों के साथ समान व्यवहार किया जायेगा । 10- सीआरसी, बीआरसी, बाइट्स, डाइट्स और एससीआरटी को पुनर्जीवित किया जायेगा । 11 - कोचिंग तथा नम्बरों की होड़ को खत्म करने के लिए कक्षा 10 तथा 12 में बोर्ड परीक्षा को समाप्त कर दिया जाएगा। इसकी जगह हर विषय का मॉड्यूल आधारित मूल्यांकन किया जाएगा, जिसे 9 से 12 तक कभी भी लिया जा सकता है। 12- कक्षा 3, 5, 8 में सेंसस परीक्षाएं होंगी। इससे पूर्व की 'नो डिटेंशन ' नीति के दुष्परिणामों से निजात मिलेगी। 13-कक्षा 6 से 8 तक बुनियादी दक्षताओं को शिक्षा से जोड़ने की जनवरी/2020 सुनाने, रंगमंच, चित्रों तथा लिखी सामग्री को डिस्प्ले तथा सप्ताह में एक बार पढ़ी किताब को साझा करने की बात कही गयी है । 22- उपचारात्मक शिक्षण के लिए स्थानीय स्वयंसेवकों द्वारा विद्यालय समय से पूर्व व बाद में शिक्षण कार्य करने की बात कही गयी है । इन प्रस्तावों को पढ़ते हुए मन में सवाल उठता है कि क्या नई शिक्षा नीति ऐसे कुछ उपाय करने जा रही है, जिससे पुरानी कमियां दूर होगी और शिक्षा संवैधानिक तथा लोकतांत्रिक अपेक्षाओं के अनुरूप हो सकेगी। शिक्षा का क्षेत्र बहुत बड़ा है। इसको कुशल नेतृत्व प्रदान करने के लिए पहली तथा दूसरी शिक्षा नीति ने ' भारतीय शिक्षा सेवा' के गठन की बात की थी, जो होता हुआ नहीं दिख रहा है। सरकारी स्कूल संसाधनों की दृष्टि से कमजोर पड़ते जा रहे हैं। दूसरी शिक्षा नीति द्वारा प्राथमिक स्कूलों में प्रत्येक कक्षा के लिए शिक्षक का संकल्प भी इस नीति में पूरा होता हुआ नहीं दिख रहा। स्कूल कैंपस तथा स्कूलों के एकीकरण की जो आकर्षक लगती हुयी बात कही गयी है, दरअसल वह स्कूलों को संसाधनों से पूर्ण करने के बजाय बड़े पैमाने पर सरकारी स्कूलों को बंद करने की योजना के रूप में सामने आ सकती है। स्कूल में पढ़ाई के घंटे तय होते हैं, ऐसे में स्कूलों में बच्चों को उपचारात्मक शिक्षण देना संभव नहीं हो पाता। नई शिक्षा नीति सीखने में कमजोर बच्चों पर ध्यान देने के लिए स्वयंसेवकों की नियुक्ति की बात करती है। देखना होगा कि शिक्षा नीति में इसका क्या स्वरूप होगा ? फिलहाल केन्द्र सरकार शिक्षा नीति के मसौदे पर लोगों की राय लेकर उसे जारी करने की बात कर रही है। शिक्षा नीति तथा उसकी विस्तृत कार्ययोजना सामने आने पर ही ठोस रूप से कुछ कहा जा सकता है। मसौदे से कोई निश्चित राय बनाना संभव नहीं है। ☐ ☐ ☐ शैक्षिक दख़ल // 60
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