और अंत में नई शिक्षा नीति से हमारी अपेक्षाएं • दिनेश कर्नाटक 66 - पहली और दूसरी शिक्षा नीति ने सभी को शिक्षा के समान अवसर मुहैया करने के लिए समान स्कूल प्रणाली की वकालत की थी, दुर्भाग्य से यह बात सिर्फ 'एक अच्छा विचार' बनकर रह गयी है । अगर देश में अभाव है तो उसे सभी बच्चों को समान रूप से महसूस करना चाहिए। एक बंटी हुई - भेदभाव युक्त शिक्षा, बंटे हुए भेदभावपूर्ण समाज की ही रचना कर सकती है। इन सबके साथ पूर्व-प्राथमिक शिक्षा को प्राथमिक शिक्षा के साथ जोड़ने की बात 1986 की शिक्षा नीति में कही गई थी, उसकी आज क्या स्थिति है, हम सब परिचित हैं। इस दिशा में ठोस कार्यवाही की आवश्यकता है। शिक्षा आज देश का सर्वाधिक बड़ा क्षेत्र है, इस सेक्टर के प्रभावी नियमन की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं है, जिसके कारण इस क्षेत्र में घोर अराजकता है। दोनों शिक्षा नीतियों ने 'भारतीय शिक्षा सेवा' के गठन की बात की थी, जो आज तक नहीं हो सका है। , , , केन्द्रीय सरकार नई शिक्षा नीति के निर्माण में जोर-शोर से लगी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 1968 तथा 1986 के बाद यह तीसरी शिक्षा नीति होगी। पहली और दूसरी शिक्षा नीति के बीच 18 वर्ष का फासला था। अब करीब 30 साल बाद तीसरी शिक्षा नीति के बारे में सोचा जा रहा है। दूसरी शिक्षा नीति से वर्तमान शिक्षा नीति के बीच फासला काफी बढ़ चुका है। इसमें कोई मतभेद नहीं हो सकता है कि नई तथा बदली हुई परिस्थितियों में शिक्षा के उद्देश्यों एवं उसकी दशा-दिशा पर विचार करना तथा उसके अनुरूप शिक्षा नीति का निर्माण करना आवश्यक होता है। इसके जरिये हमें पिछली शिक्षा नीतियों की समीक्षा का भी मौका मिलता है। इस अवसर पर हम देख सकते हैं कि क्या पिछली शिक्षा नीतियों में जो - संकल्प लिए गये थे, उन्हें पूरा किया गया है ? यदि नहीं पूरा किया जा सका तो वे कौन सी बाधाएं थी जिनके कारण उन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सका ? नई शिक्षा नीति के निर्माण के लिए केन्द्र सरकार ने एक 13 बिन्दु का प्रपत्र जारी किया है, जिसके जरिये विभिन्न स्तरों पर लोगों से सुझाव मांगे जा रहे हैं। यह सरकार की नई शिक्षा नीति के निर्माण में जनभागीदारी की मंशा को तो दिखाता है, लेकिन इन बिन्दुओं से गुजरने के बाद ऐसा लगता है मानो शिक्षा नीति का प्रारूप पहले से तैयार है, आपको सिर्फ कुछ मुद्दों पर अपनी राय भर देनी है। मसलन इन 13 बिन्दुओं में सन 2015 या उसके बाद के दौर में शिक्षा का क्या उद्देश्य होगा इसकी कोई चर्चा नहीं है। ध्यान रहे, प्रत्येक शिक्षा नीति को वर्तमान तथा भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सबसे पहले शिक्षा को व्याख्यायित करना होता है। शिक्षा के उद्देश्यों को स्पष्ट करने के बाद ही उनको प्राप्त करने की रूपरेखा बनायी जा सकती है। यहां पहला ही बिन्दु प्रारंभिक शिक्षा में अधिगम परिणाम सुनिश्चित करने पर सुझाव आमंत्रित करता है। हमसे पूछा जा रहा है कि बच्चे पढ़ाए हुए को सीख जाएं, यह कैसे संभव होगा ? अर्थात जोर उसके सीखने पर ज्यादा है। क्या सीखे और क्यों सीखे ? इन सवालों से कोई मतलब नहीं है। सिर्फ परिणाम की चिंता है। ध्यान दें, यही बाजार का भी दर्शन है, मुनाफा (परिणाम) चाहिए फिर वह चाहे जैसे भी प्राप्त हो ! क्या परिणाम की यह चाह शिक्षा में भी बाजार की तरह लागू की जा सकती है ? क्या सरकार इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जरूरी सभी संसाधनों की व्यवस्था करने को तैयार है ? क्या सीखने की प्रकिया सभी बच्चों में समान होती है, जो हम सभी बच्चों से समान परिणाम प्राप्त कर सकते हैं ? और अगर सिर्फ परिणाम की चिन्ता की जाएगी तो इसका एक बड़ा खतरा यह है कि शिक्षक इस लक्ष्य को फिर से रटाकर या भय दिखाकर प्राप्त करने की कोशिश जनवरी/2016 शैक्षिक दखल / / 54
पृष्ठ:नई शिक्षा नीति से हमारी अपेक्षाएं.pdf/१
दिखावट