करने लगेंगे। तो क्या हम शिक्षा में कुछ आगे बढ़ने के बाद फिर से पीछे मुड़ने की तैयारी कर रहे हैं ? पहली शिक्षा नीति ने शिक्षा की समाज तथा व्यक्ति को बदलने में प्रभावी भूमिका स्वीकार की थी। उसने उसे सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक रूपांतरण का औजार व राष्ट्रीय विकास का ताकतवर साधन माना था। उस समय देश नया-नया आजाद हुआ था। देश में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में बहुत कुछ किए जाने की जरूरत थी । इसलिए शिक्षा के द्वारा रूपांतरण तथा विकास की बात सोची गई। जबकि दूसरी शिक्षा नीति ने शिक्षा से अपेक्षा की थी कि वह समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र जैसे संवैधानिक मूल्यों की प्राप्ति में सहायक हो। इस शिक्षा नीति ने शिक्षा को वर्तमान तथा भविष्य के निर्माण का अनुपम साधन माना था । आज के संदर्भ में भी इन उद्देश्यों से भला किसे आपत्ति हो सकती है ? सच तो यह है कि इन उद्देश्यों को अभी प्राप्त ही नहीं किया जा सका है। शिक्षा वह भूमिका नहीं निभा सकी है, जिसकी उससे अपेक्षा की गयी थी। क्या कारण है कि लोगों में, देश, समाज तथा संस्थाओं के प्रति अपनेपन का भाव विकसित नहीं हो सका ? करूणा, प्रेम, समानता, लोकतंत्र धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्यों के प्रति लोगों में हिकारत का भाव है। अधिकांश लोग किसी भी तरह पद, प्रतिष्ठा तथा धन प्राप्त करने को ही जीवन की सार्थकता समझ रहे हैं। सबके जीवन की बेहतरी कला-संगीत-साहित्य, ज्ञान-विज्ञान, खेल-कूद, आविष्कार - सृजन जैसी चीजों के प्रति लोगों में कोई उत्साह नहीं है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सृजनशील लोग दुर्लभ से होते जा रहे हैं। हमारे आस-पास केवल मालिक नौकर और बनिये किस्म के लोग ही नजर आ रहे हैं। शारीरिक श्रम को सम्मान नहीं मजबूरी और अपमान माना जा रहा है। - ऐसे में नयी शिक्षा नीति के निर्माण का काम काफी विचार-विमर्श, गंभीरता तथा जिम्मेदारी का काम हो जाता है। नयी शिक्षा नीति में श्रम की गरिमा तथा सृजनात्मकता के विषय पर हर हाल में काम किये जाने की जरूरत है। हमारे सामने एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा है कि कैसे हमारी आने वाली पीढ़ी श्रम करने से बचने तथा नौकरी पाने की उत्सुकता के बजाय 'सर्जक' बनने में गौरव अनुभव करे। इसके लिए हमारी शिक्षा को प्रयोग से सिद्धांत की ओर जाने का रास्ता पकड़ना होगा। यानी प्रेक्टिकल 70 नंबर और थ्योरी को 30 नंबर का करना होगा। अभी इसका उल्टा होता है। प्राथमिक शिक्षा में खेल और काम (श्रम) को प्रमुखता देनी होगी। बच्चों को इन दोनों में खूब आनंद आता है। गृहणियों, किसानों, मजदूरों, मिस्त्रियों, लोहारों, कारपेंटरों आदि को अपने कामों से बच्चों को परिचित कराने को कहा जाए। इससे न सिर्फ इन कार्यों तथा श्रम को प्रतिष्ठा मिलेगी, बल्कि एक मेहनतकश पीढ़ी तैयार होगी। एक सृजनशील समाज ही भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, जातीय भेदभाव जैसी बुराइयों से दूर रह सकता है। पहली शिक्षा नीति ने सभी बच्चों को प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा या परिवेश की भाषा में शिक्षा देने की बात की थी, उसने राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने और विविधताओं का सम्मान करने के लिए त्रिभाषा सूत्र प्रस्तावित किया था जो अभी तक जवाहर नवोदय विद्यालय को छोड़कर और कहीं लागू नहीं हो पाया है। इसे लागू करने की जरूरत है। पहली और जनवरी/2016 दूसरी शिक्षा नीति ने सभी को शिक्षा के समान अवसर मुहैया करने के लिए समान स्कूल प्रणाली की वकालत की थी, दुर्भाग्य से यह बात सिर्फ 'एक अच्छा विचार' बनकर रह गयी है। अगर देश में अभाव है तो उसे सभी बच्चों को समान रूप से महसूस करना चाहिए। एक बंटी हुई - भेदभाव युक्त शिक्षा, बंटे हुए-भेदभावपूर्ण समाज की ही रचना कर सकती है। इन सबके साथ पूर्व-प्राथमिक शिक्षा को प्राथमिक शिक्षा के साथ जोड़ने की बात 1986 की शिक्षा नीति में कही गई थी, उसकी आज क्या स्थिति है, हम सब परिचित हैं। इस दिशा में ठोस कार्यवाही की आवश्यकता है। शिक्षा आज देश का सर्वाधिक बड़ा क्षेत्र है. इस सेक्टर के प्रभावी नियमन की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं है, जिसके कारण इस क्षेत्र में घोर अराजकता है। दोनों शिक्षा नीतियों ने 'भारतीय शिक्षा सेवा' के गठन की बात की थी, जो आज तक नहीं हो सका है। यदि हम शिक्षा के क्षेत्र में प्रभावी नियमन चाहते हैं तथा शिक्षा नीतियों के उद्देश्यों को प्राप्त करना चाहते हैं तो यह कार्य हमें इस शिक्षा नीति में अवश्य करना होगा। पहली शिक्षा नीति ने शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रति0 खर्च करने की वकालत की थी जो दूसरी शिक्षा नीति के 'कम खर्च के हानिकारक परिणाम' जैसी चेतावनी के बाद भी धरातल पर नहीं उतर पाया है। 1986 की शिक्षा नीति के द्वारा प्राथमिक शिक्षा में दो शिक्षक-दो कमरे की अवधारणा ने सरकारी प्राथमिक शिक्षा को तबाह करने में सबसे बड़ा योगदान दिया। हालांकि इस शिक्षा नीति में ही यह भी कहा गया था कि 'जल्दी ही प्रत्येक कक्षा के लिए एक शिक्षक की व्यवस्था की जाएगी। दुर्भाग्य से वह जल्दी ही आज तक शिक्षा नीति से जमीन पर नहीं उतर सका है। सर्वशिक्षा अभियान के जरिये 'शिक्षा विभाग' के समानांतर एक और विशाल ढांचा खड़ा कर, शिक्षकों की कमी को दूर करने के बजाय वहां मौजूद शिक्षकों को विद्यालय से बाहर कर दिया गया । विद्यालय में बचे हु शिक्षकों को शिक्षण का काम करने की छूट देने के बजाय उन्हें 'मिड डे मील' 'सेवारत प्रशिक्षण' तथा तरह-तरह की सूचनाओं के काम में झौंककर प्राथमिक शिक्षा को तबाह किया गया और इस तबाही का दोषी बड़ी ही खूबसूरती से शिक्षकों को ठहरा दिया गया। नई शिक्षा नीति से हमारी अपेक्षा है कि सर्व शिक्षा तथा राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा जैसे अभियानों को समाप्त कर शिक्षा से जुड़े कार्य शिक्षा विभाग के जरिए संपन्न किए जाएं। 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम में संशोधन कर 25 प्रति0 बच्चों को निजी स्कूलों में आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त कर सभी बच्चों को उनके पड़ौसी स्कूल में समान 'अफोर्डेबल' शुल्क में गुणवत्तायुक्त शिक्षा उपलब्ध करवाई जाए। इसके लिए निजी स्कूलों में संसाधनों की अराजकता समाप्त की जाए। सभी स्कूलों में संसाधनों का एक स्तर सुनिश्चित किया जाए। शिक्षा के क्षेत्र में श्रेष्ठ मस्तिष्कों को आने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु उन्हें समान वेतन प्रदान किया जाए। यदि नई शिक्षा नीति पिछली शिक्षा नीतियों के अधूरे कार्यों को पूरा करने तथा देश के संविधान के अनुरूप शिक्षा को समानता, न्याय, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्यों को प्राप्त करने के औजार के रूप में देखती है, तभी इसकी सार्थकता है, वरना राष्ट्रव्यापी रायशुमारी तथा एक और नई शिक्षा नीति के निर्माण का कोई अर्थ नहीं रह जाता। शैक्षिक दखल // 55
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