पृष्ठ:निर्मला.djvu/१२१

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निर्मला
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कारण न लाना चाहते हों,तो मुझे मेरे घर भेज दीजिए। मैं वहाँ आराम से रहूँगी।

मुन्शी जी ने इसका कुछ जवाब न दिया। बाहर चले गए;और एक क्षण में गाड़ी स्कूल की ओर चली।

मन! तेरी गति कितनी विचित्र है,कितनी रहस्य से भरी हुई, कितनी दुर्मेध? तू कितनी जल्द रङ्ग बदलता है? इस कला में तू निपुण है। आतिशबाज़ की चर्बी को भी रङ्ग बदलते कुछ देर लगती है; पर तुझे रङ्ग बदलने में उसका लक्षांश समय भी नहीं लगता! जहाँ अभी वात्सल्य था,वहाँ फिर सन्देह ने आसन जमा लिया।

वह सोचते जाते थे-कहीं उसने बहाना तो नहीं किया है?