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निर्मला
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तुम कहाँ हो? तुम्हारा बेटा, जिस पर तुम प्राण देती थीं-जिसे तुम अपने जीवन का आधार समझती थीं, आज घोर सङ्कट में है! उसी का पिता उसकी गर्दन पर छुरी फेर रहा है! हाय, तुम कहाँ हो!!

मन्साराम फिर शान्त चित्त से सोचने लगा-मुझ पर यह सन्देह क्यों हो रहा है? इसका क्या कारण है? मुझमें ऐसी,कौन सी बात उन्होंने देखी जिससे उन्हें यह सन्देह हुआ। वह मेरे पिता हैं;मेरे शत्रु नहीं हैं, जो अनायास ही मुझ पर अपराध लगाने बैठ जायँ । ज़रूर उन्होंने कोई न कोई बात देखी या सुनी है। उनका मुझ पर कितना स्नेह था! मेरे बगैर भोजन करने न जाते थे,वही मेरे शत्रु हो जायें, यह बात अकारण नहीं हो सकती!

अच्छा इस सन्देह का बीजारोपण किस दिन हुआ? मुझे बोर्डिङ्ग हाउस में ठहराने को बात तो पीछे की है। जिस दिन रात को वह मेरे कमरे में आकर मेरी परीक्षा लेने लगे थे,उसी दिन उनकी त्योरियाँ बदली हुई थी। उस दिन ऐसी कौन सी बात हुई, जो उन्हें अप्रिय लगी हो! मैं नई अम्माँ से कुछ खाने को माँगने गया था। बाबू जी उस वक्त वहाँ बैठे था। हाँ, अब याद आता है उसी वक्त. उनका चेहरा तमतमा गया था। उसी दिन से नई अम्माँ ने मुझसे पढ़ना छोड़ दिया। अगर मैं जानता कि मेरा घर में आना-जाना,अम्माँ जी से कुछ कहना-सुनना और उन्हें पढ़ाना-लिखाना पिता जी को बुरा लगता है, तो आज क्यों यह नौबत आती? और नई अम्माँ! उन पर क्या बीत रही होगी?