पृष्ठ:निर्मला.djvu/१२८

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दसवां परिच्छेद
 

मन्साराम ने अब तक निर्मला की ओर ध्यान ही नहीं दिया था। निर्मला का ध्यान आते ही उसके रोएँ खड़े हो गए! हाय, उनका सरल स्नेहशील हृदय यह आघात कैसे सह सकेगा? आह! मैं कितने भ्रम में था? मैं उनके स्नेह को कौशल समझता था! मुझे क्या मालूम था कि उन्हें पिता जी का भ्रम शान्त करने के लिए मेरे प्रति इतना कहु व्यवहार करना पड़ता है। आह! मैंने उन पर कितना अन्याय किया है। उनकी दशा तो मुझसे भी खराब हो रही होगी। मैं तो यहाँ चला आया, मगर वह कहाँ जाएंगी। जिया कहता था,उन्होंने दो दिन से भोजन नहीं किया! हर दम रोया करती हैं! कैसे जाकर समझाऊँ? वह इस अभागे के पीछे क्यों अपने सिर यह विपत्ति ले रही हैं! वह क्यों बार-बार मेरा हाल पूछती हैं? क्यों बार-बार मुझे बुलाती है? कैसे कह दूँ कि माता मुझे तुमसे ज़रा भी शिकायत नहीं,मेरा दिल तुम्हारी तरफ से साफ है।

वह अब भी बैठी रो रही होगी! कितना बड़ा अनर्थ है? बाबू जी को यह क्या हो गया है? क्या इसीलिए विवाह किया था? एक बालिका की हत्या करने ही के लिए उसे लाए थे! इस कोमल पुष्प को मसल डालने ही के लिए तोड़ा था?

उनका उद्धार कैसे होगा? उस निरपराधिनी का मुख कैसे उज्ज्वल होगा? उन्हे केवल मेरे साथ स्नेह का व्यवहार करने के लिए यह दण्ड दिया जा रहा है! उनकी सज्जनता का उन्हें यह उपहार मिल रहा है! मैं उन्हे इस प्रकार निर्दय आघात सहते देख