पृष्ठ:निर्मला.djvu/१२९

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निर्मला
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कर बैठा रहूँगा! अपनी मान-रक्षा के लिए न सही उनकी

आत्म-रक्षा के लिए इन प्राणों को बलिदान करना पड़ेगा! इसके सिवाय उद्धार का और कोई उपाय नहीं। आह! दिल में कैसेकैसे अरमान थे। वे सब खाक में मिला देने होंगे। एक सती पर सन्देह किया जा रहा है;और मेरे कारण! मुझे अपने प्राणों से उसकी रक्षा करनी होगी,यही मेरा कर्तव्य है। इसी में सच्ची वीरता है! माता,मैं अपने रक्त से इस कालिमा को धो दूंगा। इसी में मेरा और तुम्हारा दोनों का कल्याण है! वह दिन भर इन्हीं विचारों में डूबा रहा। शाम को उसके दोनों भाई आकर घर चलने के लिए आग्रह करने लगे। सियाराम-चलते क्यों नहीं? मेरे भैया जी, चले चलो न!

मन्साराम-मुझे फुरसत नहीं है कि तुम्हारे कहने से चला चलूँ।

जिया०-आखिर कल तो इतवार ही है!

मन्सा०-इतवार को भी काम है।

जिया-अच्छा,कल आओगे न?

मन्सा०-नहीं,कल मुझे एक मैच में जाना है।

सिया०-अम्माँ जी मूंग के लड्डू बना रही हैं। न चलोगे तो एक भी न पाओगे। हम-तुम मिल के खा जायँगे;'जिया, इन्हें न देंगे।

जिया०-भैया, अगर तुम कल न गए,तो शायद अम्माँ जी यहीं चली आयें।