पृष्ठ:निर्मला.djvu/१३५

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निर्मला
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लगी-उनके पास यह मिठाई लेती जा और कहना मेरे कारण घर क्यों छोड़ दिया है ? कहाँ रख दूं यह थाली ?

सन्साराम ने रुखाई से कहा-थाली अपने सिर पर पटक दे, चुडैल वहाँ से चली है मिठाई लेकर ! खबरदार, जो फिर कमी इधर आई । सौगात लेकर चली हैं ! जाकर कह देना मुझे उनकी मिठाई नहीं चाहिए! जाकर कह देना तुम्हारा घर है, तुम रहो; वहाँ वे बड़े आराम से हैं। खूब खाते और मौज करते हैं। सुनती है, बाबू जी के मुंह पर कहना, समझ गई ? मुझे किसी का डर नहीं है ; और जो करना चाहें कर डालें, जिससे दिल में कोई अरमान न रह जाय । कहें तो इलाहाबाद, लखनऊ, कलकत्ता चला जाऊँ । मेरे लिए जैसे बनारस वैसे दूसरा शहर ! यहाँ क्या रक्खा है। भुङ्गी-भैया, मिठाई रख लो, नहीं रो-रोकर मर जायेंगी। सचं मानो, रोकर मर जायँगी। ___ मन्साराम ने आँसुओं के उठते हुए वेग को दवा कर कहामर जायँगी, मेरी बला से ! कौन मुझे बड़ा सुख दे दिया है, जिसके लिए पछताऊँ। मेरा तो उन्होंने सर्वनाश कर दिया। कह देना मेरे पास कोई संदेशा न भेजें, कुछ जरूरत नहीं ! भुङ्गी-भैया, तुम तो कहते हो यहाँ खूब खाता हूँ और मौज करता हूँ; मगर देह तो आधी भी नहीं रही। जैसे आए थे उसके आधे भी नहीं रहे ! मन्साराम-यह तेरी आँखों का फेर है, देखना दो-चार दिन में