पृष्ठ:निर्मला.djvu/१३६

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दसवां परिच्छेद
 
मुटा कर कोल्हू हो जाता हूँ कि नहीं। उनसे यह भी कह देना कि रोना-धोना बन्द करें। जो मैंने सुना कि रोती हैं और खाना नहीं खाती, तो मुझसे धुरा कोई नहीं। मुझे घर से निकाला है, तो अब चैन से रहें । चली हैं प्रेम दिखाने ! मैं ऐसे त्रिया-चरित्र वहुत पढ़े वैठा हूँ।

भुङ्गी चली गई। मन्साराम को उससे बातें करते ही करते कुछ ठण्ड मालूम होने लगी थी। यह अभिनय करने के लिए उसे अपने मनोभावों को जितना दवाना पड़ा था, वह उसके लिए असाध्य था। उसका आत्म-सम्मान उसे इस कुटिल व्यापार का जल्द से जल्द अन्त कर देने के लिए वाध्य कर रहा था; पर इसका परिणाम क्या होगा ? निर्मला क्या यह आघात सह सकेगी ? अब तक वह मृत्यु-कल्पना करते समय किसी अन्य प्राणी का विचार न करता था, पर आज एकाएक उसे ज्ञात हुआ कि मेरे जीवन के साथ एक और प्राणी का जीवन-सूत्र भी बँधा हुआ है। निर्मला यही समझेगी कि मेरी निष्ठुरता ही ने इनकी जान ली। यह समझ कर उसका कोमल हृदय क्या फट न जाएगा ? उसका जीवन तो अब भी सङ्कट में है। सन्देह के कठोर पजे में फंसी हुई अवला क्या अपने को हत्यारिणी समझ कर बहुत दिन जीवित रह सकती है ? मन्साराम ने चारपाई पर लेट कर लिहाफ़ ओढ़ लिया, फिर भी मारे सर्दी से कलेजा कॉप रहा था । थोड़ी ही देर में उसे जोर से ज्वर चढ़ आया-वह बेहोश हो गया। इस अचेत दशा में