पृष्ठ:निर्मला.djvu/१३९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
निर्मला
१३६
 

अध्यक्ष ने हेडमास्टर का नाम सुना,तो समझे कि यह महाशय मुझे धमकी दे रहे हैं। जरा तिनक कर बोले-हेडमास्टर नियम-विरुद्ध कोई बात नहीं कर सकते। मैं इतनी बड़ी जिम्मेदारी कैसे ले सकता हूँ?

अब क्या हो? क्या घर ले जाना ही पड़ेगा? यहाँ रखने का तो यह वहाना था कि ले जाने से बीमारी बढ़ जाने की शङ्का है। यहाँ से ले जाकर अस्पताल में ठहराने के लिए कोई बहाना नहीं है। जो सुनेगा वह यही कहेगा कि डॉक्टर की फीस बचाने के लिए लड़के को अस्पताल फेंक आए;पर अब ले जाने के सिवा और कोई उपाय न था। अगर अध्यक्ष महोदय इस वक्त रिश्वत लेने पर तैयार हो जाते,तो शायद दो-चार साल का वेतन ले लेते; लेकिन कायदे के पाबन्द लोगों में इतनी बुद्धि,इतनी चतुराई कहाँ! अगर इस वक्त मुन्शी जी को कोई आदमी ऐसा उन्न सुझा देता,जिसमें उन्हें मन्साराम को घर न ले जाना पड़े,तो वह आजीवन उसका एहसान मानते। सोचने का समय भी नहीं था। अध्यक्ष महोदय शैतान की तरह सिर पर सवार थे। विवश होकर मुन्शी जी ने दोनों सईसों को बुलाया और मन्साराम को उठाने लगे। मन्साराम अर्द्ध-चेतना की दशा में था। चौंक कर बोला-क्या है? कौन है?

मुन्शी जी-कोई नहीं है;बेटा! मैं तुम्हें धर ले चलना चाहता हूँ; आओ मैं गोद में उठा लूँ।

मन्साराम-मुझे घर क्यों ले चलते हैं? मैं वहाँ नहीं जाऊँगा।