पृष्ठ:निर्मला.djvu/१५३

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निर्मला
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ऐसे आदर्श-चरित्र वालक पर तुमने इतना घोर कलङ्क लगा दिया! अब बैठे क्या बिसूरते हो? तुमने उससे हाथ धो लिया। मैं तुम्हारे निर्दय हाथों से छीन कर उसे अपने साथ लिए जाती हूँ। तुम तो इतने शकी कभी न थे,क्या विवाह करते ही शक को भी गले बाँध लाए? इस कोमल हृदय पर इतना कठोर आघात!इतना भीषण कलङ्क! इतना बड़ा अपमान सह कर जीने वाले कोई बेहया होंगे! मेरा बेटा नहीं सह सकता। यह कहते-कहते उसने बालक को गोद में उठा लिया और चली। मुन्शी जी ने रोते हुए उसकी गोद से मन्साराम को छीनने के लिए हाथ बढ़ाया,तो आँखें खुल गई और डॉक्टर लहिरी; डॉक्टर भाटिया आदि आधे दर्जन डॉक्टर उनके सामने खड़े दिखाई दिए!