पृष्ठ:निर्मला.djvu/१५६

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बारहवाँ परिच्छेद
 

भी गए थे? आज क्या हाल है? तुम्हारे भैया उठे या नहीं?

जियाराम रुाँसा होकर बोला-अम्माँ जी, आज तो वह कुछ बोलते-चालते ही न थे। चुपचाप चारपाई पर पड़े जोर-जोर से हाथ-पाँव पटक रहे थे।

निर्मला के चेहरे का रङ्ग उड़ गया। घबरा कर पूछा-तुम्हारे वाबू जी वहाँ न थे?

जियाराम-थे क्यों नहीं। आज वह बहुत रोते थे! निर्मला का कलेजा धक-धक करने लगा। पूछा-डॉक्टर लोग वहाँ न थे?

जियाराम-डॉक्टर भी खड़े थे और आपस में कुछ सलाह कर रहे थे। सबसे बड़ा सिविल सर्जन अगरेजी में कह रहा था कि मरीज़ के देह में कुछ ताज़ा खून डालना चाहिए। इस पर वाबू जी ने कहा-मेरी देह से जितना खून चाहे ले लीजिए। सिविलसर्जन ने हँस कर कहा-आपके ब्लॅड ( Blood ) से काम नहीं चलेगा। किसी जवान आदमी का व्लॅड चाहिए,आखिर उसने पिचकारी से कोई दवा भैया के वाजू में डाल दी। चार अङ्गुल से कम की सुई न रही होगी;पर भैया मिनके तक नहीं। मैंने तो मारे डर के आँखें बन्द कर ली!

बड़े-बड़े महान् सङ्कल्प आवेश मे ही जन्म लेते हैं। कहाँ तो निर्मला भय से सूखी जाती थी,कहाँ उसके मुख पर दृढ़ सङ्कल्प: की आभा झलक पड़ी। उसने अपनी देह का ताजा खून देने का