पृष्ठ:निर्मला.djvu/१६७

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निर्मला
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गया था, उसने तो कहा था कि लड़का ही इन्कार कर रहा है ! लड़ने की साँ अलबत्ता देवी थी । उसने पुत्र और पति दोनों ही को जनन्नया: पर उसकी कुछ न चली !

सुधा- तो उस लड़के को पाती; तो खूब भाड़ हार्थों लेती ! निनला रे भाग्य में तो जो लिखा था, वह हो चुका ! वंचारी कृष्ण पर न जाने क्या बीतेगी ? सन्ध्या सन्य निर्मला के जाने के बाद जब डॉक्टर साहब बाहर ले आप तो नुया ने कहा क्यों जी, तुम उस आदमी को ज्या कोंगे, जो एक जगह विवाह ठीक कर लेने के बाद फिर लोभवश किसी दूसरी जगह सन्बन्ध कर ले ? ____डॉन्टर सिन्हा ने स्त्री की और कुतुहल से देख कर कहाऐसा नहीं करना चाहिए और क्या ? सुवा-यह क्यों नहीं कहते कि यह घोर नीचता है-परले लिरे का कमीनापन है! सिन्हा-हाँ, यह कहन में भी सुने इन्कार नहीं ! सुधा-किलका अपराध बड़ा है ? वर का या घर के पिता का? सिन्हा की नमन में अभी तक नहीं आया कि सुधा के इन प्रश्नों का प्राशय क्या है । विस्मय से बोले-जैसी स्थिति हो। अगर वर पिता के आधीन हो, तो पिता ही का अपराध समझो ! सुधा-आधीन होने पर भी च्या जवान आदमी का अपना कोई कर्तव्य नहीं है ? अगर उसे अपने लिए नए कोट की जरूरत हो,