पृष्ठ:निर्मला.djvu/१७२

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तेरहवाँ परिच्छेद
 

हो? जिसकी गर्दन पर कटार चलाई है,जरा उसे तड़पते भी तो देखो! मेरे दादा जी ने पाँच हजार दिये न!अभी छोटे भाई के विवाह में पाँच-छः हजार और मिल जायेंगे। फिर तो तुम्हारे वरावर धनी संसार में कोई दूसरा न होगा? ग्यारह हजार बहुत होते हैं; वाप रे वाप! ग्यारह हजार!! उठा-उठा कर रखने लगे,तो महीनों लग जायँ। अगर लड़के उड़ाने भी लगे,तो तीन पीढ़ियों तक चले। कहीं से बातचीत हो रही है या नहीं? इस परिहास से डॉक्टर साहब इतना मेंपे कि सिर तक न उठा सके। उनका सारा वाक्-चातुर्य गायब हो गया।नन्हा सा मुंह निकल आया,मानो मार पड़ गई हो। इसी वक्त किसी ने डॉक्टर साहब को वाहर से पुकारा। वेचारे जान लेकर भागे। स्त्री कितनी परिहास-कुशल होती है इसका आज परिचय मिल गया!

रात को डॉक्टर साहव शयन करते हुए सुधा से बोले-निर्मला की तो कोई वहिन और है न?

सुधा-हाँ,आज उसकी चर्चा तो करती थी। उसकी चिन्ता अभी से सवार हो रही है। अपने ऊपर तो जो कुछ बीतना था,वीत चुका; बहिन की फिक्र में पड़ी हुई है! माँ के पास तो अव और भी कुछ नहीं रहा;मजबूरन किसी ऐसे ही बूढ़े बाबा के गले वह भी मढ़ दी जायगी।

सिन्हा-निर्मला तो अब अपनी माँ की मदद कर सकती है। सुधा ने तीक्ष्ण स्वर में कहा-तुम भी कभी-कभी बिलकुल वे सिर-पैर की बातें करने लगते हो। निर्मला बहुत करेगी,तो दो-