पृष्ठ:निर्मला.djvu/१७६

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चौदहवां परिच्छेद
 

अभावों के साथ यह चिन्ता भी उसके सिर सवार हुई, उसने दाई द्वारा कहला भेजा मेरे सब गहने बेच कर घर को बचा लीजिये; लेकिन मुन्शी जी ने यह प्रस्ताव किसी तरह स्वीकार न किया।

उस दिन से मुन्शी जी और भी चिन्ता-यस्त रहने लगे। जिस धन का मुख भोगने के लिए उन्होंने विवाह किया था,वह अब अतीत की स्मृति-मात्र था। वह मारे ग्लानि के अब निर्मला को अपना मुँह तक न दिखा सकते थे। उन्हें अब उस अन्याय का अनुमान हो रहा था,जो उन्होंने निर्मला के साथ किया था,और कन्या के जन्म ने तो रही-सही कसर भी पूरी कर दी-सर्वनाश ही कर डाला!

बारहवें दिन सौर से निकल कर निर्मला नवजात शिशु को गोद में लिए पति के पास गई। वह इस अभाव में भी इतनी प्रसन्न थी, मानो उसे कोई चिन्ता नहीं है! बालिका को हृदय से लगा कर वह अपनी सारी चिन्ता भूल गई थी! शिशु के विकसित और हर्प-प्रदीप्त नेत्रो को देख कर उसका हृदय प्रफुल्लित हो रहा था! मातृत्व के इस उद्गार में उसके सारे क्लेश विलीन हो गए थे! वह शिशु को पति की गोद में देकर निहाल हो जाना चाहती थी, लेकिन मुन्शी जी कन्या को देख कर सहम उठे। गोद में लेने के लिए उनका हृदय हुलसाया नहीं; पर उन्होने एक बार उसे करुण-नेत्रों से देखा; और फिर सिर झुका लिया। शिशु की सूरत मन्साराम से बिलकुल मिलती थी!

निर्मला ने उनके मन का भाव कुछ और ही समझा! उसने