पृष्ठ:निर्मला.djvu/२२७

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निर्मला २२४ दोनों लड़कों को मनाने चली। मुन्शी जी ने कड़ी कसम रखा दी। निर्मला-आप समझते नहीं हैं । यह सारा गुस्सा मुझ पर है। मुन्शी जी-गुस्ताख हो गया है । इस ख्याल से कोई सख्ती नहीं करता कि लोग कहेंगे बिना माँ के बच्चों को सताते हैं, नहीं तो सारी शरारत घड़ी भर में निकाल दूँ। निर्मला-इसी बदनामी का मुझे भी तो डर है। मुन्शी जी-अव न डरूँगा, जिसके जी में जो आए कहे । निर्मला-पहले तो यह ऐसे न थे। मुन्शी जी-अजी कहता है कि आपके लड़के मौजूद थे, आपने शादी क्यों की? यह कहते भी इसे सङ्कोच नहीं होता कि आप लोगों ने मन्साराम को विष दे दिया। लड़का नहीं है, शत्रु है। ___जियाराम द्वार पर छिप कर खड़ा था। स्त्री-पुरुष में मिठाई के विषय में क्या बातें होती हैं, यही सुनने वह आया था। मुन्शी जी का अन्तिम वाक्य सुन कर उससे न रहा गया । बोल उठा-शत्रु न होता तो आप उसके पीछे क्यों पड़ते । आप जो इस वक्त कह रहे हैं, वह मैं बहुत पहले से समझे बैठा हूँ । भैया न समझे थे, धोखा खा गए। हमारे साथ आप की दाल न गलेगी। सारा जमाना कह रहा है कि भाई साहव को जहर दिया गया। मैं कहता हूँ तो क्यों आपको गुस्सा आता है ? निर्मला तो सन्नाटे में आ गई । मालूम हुआ किसी ने उसकी देह पर अङ्गारे डाल दिए । मुन्शी जी ने डाँट कर जियाराम को