पृष्ठ:निर्मला.djvu/२३४

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बीसवाँ परिच्छेद
 

होती जाती थी। प्राण नहों में समाते जाते थे। अन्त को निराश होकर उसने छाती पर एक घुसा मारा;और रोने लगी।

गहने ही स्त्री की सम्पत्ति होते हैं। पति की और किसी सम्पत्ति पर उसका अधिकार नहीं होता। इन्हीं का उसे बल और गर्व होता है। निर्मला के पास पाँच-छः हजार के गहने थे। जब उन्हें पहन कर वह निकलती थी, तो उतनी देर के लिए उल्लास से उसका हृदय खिला रहता था। एक-एक गहना मानो विपत्ति और बाधा से बचाने के लिए एक-एक रक्षाख था। अभी रात ही उसने सोचा था । जियाराम की लौंडी बन कर वह न रहेगी। ईश्वर न करें-वह किसी के सामने हाथ फैलाए। इस खेबे से वह अपनी नाव को भी पार लगा देगी; और अपनी बच्ची को भी किसी न किसी घाट पहुँचा देगी। उसे किस बात की चिन्ता है। इन्हें तो कोई उससे न छीन लेगा। आज ये मेरे सिङ्गार हैं, कल को मेरे आधार हो जायेंगे। इस विचार से उसके हृदय को कितनी सान्त्वना मिली थी? वही सम्मत्ति आज उसके हाथ से निकल गई! अब वह निराधार थी। संसार में उसे कोई अवलम्ब, कोई सहारा न था। उसकी आशाओं का आधार जड़ से कट गया, वह फूट-फूट कर रोने लगी। ईश्वर! तुमसे इतना भी न देखा गया! मुझ दुखिया को तुमने यों ही अपङ्ग वना दिया था, अब आँखें भी फोड़ दी! अब वह किसके सामने हाथ फैलाएगी, किसके द्वार पर भीख मांगेगी। पसीने से उसकी देह भीग गई, रोते-रोते आँखें सूज गई। निर्मला सिर नीचा किए रो.