पृष्ठ:निर्मला.djvu/२४

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२१ दूसरा परिच्छेद
मतई-दो! 

उदयभानु-(गरज कर ) हट जा बदमाश सामने से ।

मतई-तीन!

मुँह से 'तीन' का शब्द निकलते ही बाबू साहब के सिर पर लाठी का ऐसा तुला हुआ हाथ पड़ा कि वह अचेत होकर जमीन पर गिर पड़े। मुँह से केवल इतनाही निकला-हाय ! मार डाला ! मतई ने समीप आकर देखा, तो सिर फट गया था; और खून की धार निकल रही थी। नाड़ी का कहीं पता न था। समझगया कि काम तमाम हो गया। उसने कलाई से सोने की घड़ी खोल ली, कुर्ते से सोने के बटन निकाल लिए, उँगली से अँगूठी उतारी और अपनी राह चला गया; मानो कुछ हुआ ही नहीं । हाँ, इतनी दया की कि लाश रास्ते से घसीट कर किनारे डाल दी। हाय ! बेचारे घर से क्या सोच कर चले थे; और क्या हो गया, जीवन ! तुझसे ज्यादह असार भी दुनिया में कोई वस्तु है ? क्या वह उस दीपक की भाँति ही क्षणभङ्गुर नहीं है, जो हवा के एक झोंके से बुझ जाता है ? पानी के उस बुलबुले को देखते हो; लेकिन उसे टूटते भी कुछ देर लगती है ; जीवन में उतना सार भी नहीं। साँस का भरोसा ही क्या ? और इसी नश्वरता पर हम अभिलाषाओं के कितने विशाल भवन बनाते हैं ! नहीं जानते नीचे जाने वाली साँस ऊपर आएगी या नहीं; पर सोचते इतनी दूर की हैं, मानो हम अमर हैं। '